भारतीय परिवारों को अपनी लड़कियों में निवेश करना किसी भी तरह से लाभदायक नहीं लगता है. परन्तु ऐसा क्यों? इस समस्या का मूल कारण क्या है और हम इसका मुकाबला किस तरह से कर सकते हैं?

डॉ. उषा किरण खान ने बताया कि बहुत सारे माता-पिता लड़कियों में निवेश नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अंततः उन्हें उनकी शादी करनी होगी. “और अगर उसे शादी के बाद किसी भी तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है, तो उसे अक्सर उसके माता-पिता द्वारा ही चुपचाप सहने की सलाह दी जाती है और कहा जाता है कि वह एडजस्ट करें.” उन्होंने कहा कि समुदाय को ऐसा होने से रोकने के लिये एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है. उनके अनुसार, वास्तविक परिवर्तन तब लाया जा सकता है जब लड़कियों पढ़ना चाहती है और उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है.

ब्रेकथ्रू इंडिया की डॉ. सुनीता मेनन ने काम करने वाली महिलाओं को पेश आने वाली असमानता के बारे में बताया. उन्होंने कहा, “बहुत से परिवार महिलाओं को काम करने की इजाजत नहीं देते हैं और यदि वे करती हैं, तो उनकी कमाई और संपत्ति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता है.” मेनन ने यह भी बताया कि लोगों को लगता है कि लड़कियों की पढ़ाई में निवेश करने से बेहतर है कि लड़की के दहेज के लिए पैसे बचायें जायें.

“हमारे समाज में, लड़कियों को एक बोझ के रूप में देखा जाता है जिसे पिता से पति को स्थानांतरित किया जाना होता है” – सुनीता मेनन

उन्होंने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों पर भी बात की और इस तथ्य पर भी ध्यान केंद्रित किया कि उनकी बात को सुना नही जाता है. उन्होंने कहा,”हर कोई जानता है कि बच्चे का लिंग पुरुषों द्वारा निर्धारित किया जाता है, लेकिन अगर लड़की पैदा होती है तो दोष महिला को ही दिया जाता है. हमें यह बदलना होगा. ”

सेफसिटी की सह-संस्थापक सुप्रीत के सिंह ने कहा कि ताक़त उसी दिन से काम करना शुरु कर देती है जिस दिन से लड़की पैदा होती है.

“जिस दिन एक लड़की पैदा होती है, उसे परया धन माना जाता है. उसे घरेलू काम सिखाया जाता है और दूसरों की देखभाल करना बताया जाता है. लड़कियों में कोई निवेश नहीं किया जाता है क्योंकि वे सोचते हैं कि “लड़की हमारा धन लेकर जायेंगी”.

उन्होंने अपने अभियान “बेटा पढ़ाओं, बेटी बचाओ” के बारे में भी बात की, जो इस विचार को बढ़ावा देते हैं कि लड़कों को सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं के साथ किस तरह का व्यवहार किया जायें ताकि महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दें को आगे बढ़ाया जा सकें.

“यह विश्वास करना इतना मुश्किल क्यों है कि महिलाएं समाज के लिए आर्थिक रूप से योगदान दे सकती हैं?” – सुप्रीत के सिंह

यूनिसेफ की मोना सिन्हा ने कहा, “कही न कही लड़कियों ने भी उन संदेशों को आंतरिक रूप से मान लिया है कि जो हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने बताया है और वह समझती हैं कि उन्हें महत्वाकांक्षी नहीं होना चाहिए.” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सोशल मीडिया एक महान प्लेटफार्म है जिसने इन प्रासंगिक मुद्दों को लेकर अच्छी बातचीत शुरू की है.

“महिलाओं को अपनी पीड़ित मानसिकता से छुटकारा पाना चाहिए और अपनी आवाज़ को मजबूत करना चाहिए” – मोना सिन्हा

प्रिक्सिस की अनिंदों बनर्जी ने कहा कि हमें इस समस्या का हल ढूंढने के लिए सभी समुदायों को शामिल करना होगा. इसके लिए, हमें उनके परिप्रेक्ष्य को समझना होगा क्योंकि उनके द्वारा किए गए कार्यों के पीछे बहुत सारे कारण होते हैं.