भारत में पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई है. महिलाओं को राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना ज़रूरी है. भारतीय आम चुनाव 2019 के संदर्भ में, हमने संजय कुमार, निदेशक, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ से बात की. क्या भारतीय महिलाएं बेहतर वोट बैंक है, महिला आरक्षण बिल और महिलाएं वोट दे क्या बदलाव चाहती है?

कैसे महिलाओं के वोट ज़रूरी है

महिलाओं के वोट के महत्व पर कुमार ने कहा, “दुर्भाग्यवश, आज भी, महिलाएं वोट बैंक नहीं मानी जाती मगर उनका वोट महत्वपूर्ण हैं. और 2019 के चुनावों में भी काफी महत्व रखेगा। पूर्व में, पार्टियों ने महिलाओं के वोट पर ध्यान नहीं दिया जो अफ़सोस की बात  है. महिलाओं का वोट बैंक न होना, उनके नज़रअंदाज़ होने का कारण है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, महिलाओं के वोट को महत्व देने का नया ट्रेंड चल रहा है. आप सरकार की नीतियों से अनुमान लगा सकते है कि महिला वोट बैंक बनाने के लिए सरकार कई प्रयास कर रही है.”

महिलाएं समुदाय के रूप में वोट नहीं देती हैं, जैसे यादव या दलित या मुसलमान विभिन्न क्षेत्रों में विशेष पार्टी के लिए वोट देते हैं, इसीलिए महिला वोट बैंक नही बन पाया. कुमार ने स्पष्ट किया कि अगर एक राजनीतिक दल 5-6% ज़्यादा महिला वोट हासिल कर पाना ही प्रतिद्वंद्वी पार्टी पर भारी जीत है. “50 प्रतिशत भारतीय वोटर महिला है. इसके बावजूद, उन्हें एक समूह के तौर पर किसी पार्टी के लिए वोट करते नहीं देखा गया है. फ़िलहाल, यह संख्या 3-4 प्रतिशत तक ही सीमित है.” कुमार राजनीति में रिसर्च कर रहे है.

महिलाएं एक महिला लीडर को वोट करना पसंद करती है

 कुमार के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में जयललिता, उत्तर प्रदेश में मायावती जैसी महिला लीडर को ज़्यादा समर्थन मिलता है. कुमार ने कहा, “हम फिर भी उनका सामूहिक समर्थन नहीं देख पाए है. महिलाएं महिला लीडर को ही वोट करती है, यह दावा नहीं, एक संकेत है.”

“महिला लीडर(चाहे चुनाव न लड़े) एक पार्टी की पहचान बन जाती है, जो की महिलाओं के वोटों के विषय में पार्टियों के पक्ष में रहा है” – कुमार

महिला प्रतिनिधित्व का कारण

राजनीतिक दलों में महिला उम्मीदवारों की कमी पर, कुमार ने कहा, “अगर पार्टी महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं देती है, इसमे उनका नुकसान है, चाहे पुरुष उम्मीदवार ही क्यों न हो, भारतीय चुनाव पार्टी पर आधारित है, न कि स्वतंत्र उम्मीदवार पर. पार्टियों के मुताबिक, महिलाओं का चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल है – ‘वे पुरुष उम्मीदवारों से कैसे जीत सकती हैं?”

महिला उम्मीदवारों की जीत

डाटा के अनुसार, महिला उम्मीदवारों की जीत पुरुषों की तुलना में अधिक है. पहला कारण, बहुत कम महिलाएं टिकट पाने में कामयाब होती हैं जबकि पुरुषों को ज़्यादा संख्या में टिकट मिलते हैं. दूसरा कारण, जब पार्टियाँ राजनीतिक दलों से संबंधित महिलाओं को ही टिकट देती हैं, तो उनके जीत के मौके अधिक होते है.

संजय कुमार, निदेशक, CSDS (Image by Livermint)

महिला आरक्षण बिल के बारे में बात करते हुए कुमार ने कहा, “इस बिल को लेकर राजनीतिक दलों के बीच कोई गंभीरता नहीं है और न ही इसकी इच्छा. घोषणा सिर्फ दूसरों को यह बताने के लिए की गई कि वह इसके खिलाफ नहीं हैं.”

महिलाएँ क्या चाहती हैं?

महिलाओं की मांग पर, कुमार बोले कि हमारे अनुसार सुरक्षा ही एक बड़ी समस्या है लेकिन ऐसा नहीं हैं. “यह चिंता का विषय है, लेकिन यह एक चुनावी मुद्दा नहीं है,” उन्होंने कहा. महिलाएं दिन-प्रतिदिन के मुद्दे जैसे महँगाई, बिजली, ग्रामीण, रोज़गार के अवसर और पेयजल के मुद्दों के बारे में अधिक चिंता करती हैं। गाँवों में महिलाओं को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती हैं.

महिलाओं ने सामूहिक मतदान को गंभीरता से लेना शुरू तो कर दिया, फिर भी हमें महिला वोट बैंक की आवश्यकता है, ताकि राजनीतिक दल महिलाओं के मुद्दों के लिए महिला वोट बैंक की आवश्यकता अधिक गंभीर हो जाएं।

 

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