एक साइकोलोजी टुडे के लेख के हिसाब से हमारे मस्तिष्क में दिनभर में करीब 60,000 ख़याल आते हैं। जिनमे से ज्यादातर बातें ऐसी होती हैं जिन्हे हम बार-बार सोचते हैं। हम जिस समाज में रह रहें हैं, वह प्रतियोगिताओं, असंतुष्टि, आदि से भरा हुआ है। इसलिए हमारे मस्तिष्क में आने वाले ज्यादातर विचार हमेशा हमे नाखुश करने में लगे रहते हैं। और उन असंख्य ख्यालों के बीच, कुछ ऐसे भी हैं जो हमारे दिमाग में एक लूप की तरह चलते रहते हैं।

इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि हम अपने मस्तिष्क से इन सभी नकारात्मक विचारों को निकालें ताकि हम दमागी और भावनात्मक स्तर पर स्वस्थ रह सकें। वैसी इन नकारात्मकताओं से बचने का कोई इलाज़ नहीं है। अब चाहे इसका कारण आप आज-कल के रहन-सहन को कह लीजिये या किसी और चीज़ को। जब आप दूसरों को खुश रहते और जीवन का आनंद लेते हुए देखते हैं, तो जाहिर सी बात है कि आपके दिमाग में भी अपने भविष्य से लेकर अपने करियर तक हर तरह के सवाल आएँगे। वैसे सोशल मीडिया इन नकारात्मकताओं को फ़ैलाने का सबसे बड़ा साधन है।

कोई कहीं पर छुट्टियां मना रहा है, किसी ने एक अच्छी नौकरी प्राप्त की है, कोई अपनी पारिवारिक ज़िंदगी का मज़ा ले रहा है, आदि बाते हमें दूसरों के बारे में जायदा तो नहीं बतातीं, लेकिन यह सब हमारे दिमाग को नकारात्मक विचारों से भरने के लिए क़ाफी हैं।

स्वाभाविक है, कि यह नकारात्मक विचार स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं जैसे तनाव, चिंता, बाइपोलर डिसऑर्डर, आदि को जन्म देते हैं।

किसी ने बच्चे को जन्म देने के बाद कितना वजन घटाया है, कोई बीच पर घूम रहा है, और मैं अपने काम से फुर्सत नहीं ले पा रहा या रही हूँ। उसके बाद मुझे अपने परिवार को भी समय देना है, कार्यसीमाओं के अंदर ही काम करना है, बचे हुए काम करने हैं, यह सब बातें नकारात्मकता के अंतर्गत नहीं आती हैं, तो यह सब क्या हैं? इनके आपके दिमाग में आने की क्या आवश्यकता है? यह सवाल आपको खुद से पूछना चाहिए।

यह सब मेरे साथ ही क्यों होता है? क्यों मुझे ही सफलता आसानी से नहीं मिलती? क्यों सभी खुश हैं और मैं नहीं? क्या होगा अगर मैं कुछ ज़रूरी भूल गयी? यह सारे प्रश्न आपके दिमाग में भी ज़रूर आते होंगे। हम किसी चीज़ का नतीजा सोचने में इतना समय बर्बाद कर देते हैं तो इसका नतीजा खुद ही अत्यधिक-सोच होता है और इससे ज्यादा कुछ नहीं। क्या इतना सोच विचार करने से आपको कोई लाभ हुआ या उसका कोई हल निकला? नहीं न। तो फिर परेशानियों को खींच-खांच कर उन्हें हद से ज्यादा बड़ा करने की क्या ज़रूरत है? जब दिमाग में इतनी नकारात्मकता है तो किसी चीज़ का हल मिलेगा भी कैसे। यह तो जैसे हज़ारों संतरों में से एक सेब ढूंढ़ने जैसी बात है।

लेखिका एमी मोरिन ने अपने लिख में बताया है कि अपने दिमाग से नकारात्मकता निकालने के तीन तरीके हैं। पहला, आप दया दलों से बाहर आएं, दूसरा, आप आत्म-संदेह न करें, और तीसरा, आप चिंता करने और किसी समस्या का हल ढूंढ़ने, इन दोनों बातों को विभाजित करें।

उनके हिसाब से अगर आप इतना ज्यादा सोचते हैं और अपने असौभाग्यवत होने पर इतना अफ़सोस जताते हैं, तो इससे आपकी समस्याएं जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं। इसलिए, अपने ऊपर दया करने से बेहतर है की आप खुद को चुनौतियां दें और इन चीज़ों से उभरें। आप जितना सोचने की क्षमता रखते हैं, उससे ज्यादा कट्टर प्रतियोगी हैं आप।

अगर आप अपनी समस्याओं का हल नहीं निकाल पा रहें है, तो अपनी मानसिकता में बदलाव लाईये।

एमी ने अपने लेख में यह कहा है कि आपको नकारात्मक ख्यालों से बचना चाहिए। लेकिन, अगर किसी कारणवश आप यह करने में असमर्थ हैं, तो इसका इलाज यह है कि आप अपने आस-पास का वातावरण पूरी तरह से बदल दें। जब यह वातावरण बदलेगा तो आपकी मानसिकता में भी बदलाव आएगा। यह बदलाव आपको आपकी समस्याओं से लड़ने में मदद कर सकता है।

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