अगर सिर्फ भारत की ही बात की जाये, तो करोड़ों देशवासियों को अवसाद और तनाव ने घेर रखा है। अवसाद और तनाव को हम एक मानसिक परेशानी की तरह देख सकते हैं लेकिन इसका इलाज़ होना भी अत्यंत आवश्यक है। एक तरफ जहां भारत में अवसाद और तनाव के बारे में बात करना एक तबू है, वहां इसका इलाज़ होना एक दूसरी समस्या है। लोग अवसाद को दिमागी समस्याओं से जोड़ देते हैं। इन सारे डरों की चपेट में आकर जो पीड़ित हैं, वे इन परेशानियों के बारे में खुलकर बात नहीं करते।

लोगों को यह डर हमेशा सताता है कि कहीं समाज के लोग, उनके परिवार के सदस्य, या उनके दोस्त उनका मूल्यांकन गलत तरह से तो नहीं करेंगे।

लेकिन अगर हम अध्यनों को देखे, तो हमे पता चलेगा कि यह समस्या काफी गंभीर है। युवाओं में यह काफी देखा जाता है लेकिन वे यह क़ुबूल करने से घबराते हैं।

अगर आप डेटा और सर्वेक्षणों पर गौर करें, तो आप यह देखेंगे कि कितने युवा तनाव ग्रस्त हैं। एक पल में आकर वे इतना परेशान हो जाते हैं कि वे अपने जीवन से कोई आशा ही नहीं कर पाते। उनका आत्म-विश्वास और हौसला इतना गिर जाता है कि वे मजबूरन आत्म-हत्या तक कर लेते हैं।

क्या हम सभी ने यह कभी सोचा है कि अगर यही स्थिति चलती रही, तो देश आने वाले वर्षों में किस तरफ पहुँचने वाले है? शायद नहीं। क्यूंकि यह कल्पना भी करना एक भयानक सपने जैसा है।

आप यह देखें कि युवा जी-जान लगाकर, मेहनत कर देश के अच्छे कॉलेजों में अपनी जगह बना पाते हैं। लेकिन एक समय में वे इतना अकेला महसूस करते हैं कि उनके पास जैसे कोई रास्ता ही नहीं बचता। वे लाखों, करोड़ों छात्रों से प्रतियोगी स्तर पर लड़कर किसी नामी संस्था में अपनी जगह बनाते हैं और फिर सर्वेक्षण यह दर्शाता है कि उनमे में ज्यादातर बच्चों ने बीच में ही कॉलेज छोड़ दिया या वे अवसाद और तनाव जैसी परेशानियों का शिकार हो गए। यह समस्या गंभीर है। और इसे गंभीरता से लिया जाना आज की जरुरत है।

अगर हम चाहते हैं कि अवसाद और तनाव इकीसवीं सदी में एक तबू न रहे, तो सभी को अपनी तरफ से कुछ कदम उठाने चाहिए। सबसे अच्छा तब होगा जब जानी-मानी हस्तियां इस मुद्दे पर अपनी बात रखेंगी। वह इसलिए क्यूंकि इन हस्तियों से लोग खुद को आसानी से जोड़ कर देख पाते हैं। जिस प्रकार अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और अन्य प्रसिद्ध लोगों ने अपनी टिप्पड़ियां की थीं, उसी प्रकार हमे में अपना योगदान इस चर्चा में जरूर देना चाहिए और इस बातचीत के चक्र को तब तक नहीं रोकना चाहिए जब तक यह चर्चा आम न हो जाये।

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