शुरुआती स्तर पर फोन्स सिर्फ बातचीत करने के लिए बनाये गए थे। लेकिन अब उनका इस्तमाल करना, एक आदत सी हो गयी है। डाटा के आने से फ़ोन का मतलब पूरी तरह से बदल चुका है। एक अध्यन से पता चला है कि आपके स्मार्ट फोन्स वाकई में आपकी मुस्कान आपसे छीन रहें हैं। वर्जिनिया विश्विद्यालय के अध्यन से यह बात सामने आयी है। नीचे लिखे हुए कुछ महत्वपूर्ण अंश उस अध्यन के ही हैं।

अध्यन में हिस्सा लेने वाले लोगों को दो-दो के जोड़ो में बांट दिया गया। कुछ को फ़ोन्स रखने दिए गए और कुछ को नहीं।

यह देखा गया कि जिन लोगों के हाथ में स्मार्ट फोन्स थे, वे काफी कम मुस्कुरा रहे थे।

अध्यन के समय लोगों को लगा की वे शोधकर्ता का इंतज़ार रहे हैं। इस बीच कुछ लोगों के पास अपने स्मार्ट फोन्स थे और कुछ लोगों के पास नहीं। यह विश्लेषण किया गया कि किस तरह स्मार्ट फोन्स की मौजूदगी लोगों के व्यक्तित्व और व्यवहार में बदलाव लाती है। जिल सुट्टीए ने अपने अध्यन के लेख में लिखा है कि जिन लोगों के पास उनके स्मार्ट फोन्स थे उनके चेहरे पर कम मुस्कान देखी गयी। अगर गिनती में देखें तो जिन लोगों के पास स्मार्ट फोन्स थे, वे स्मार्ट फोन्स के बिना अकेले बैठे लोगों से 30 प्रतिशत कम मुस्कुराये। यह प्रतिशत समय के हिसाब से निकाला गया है।

जब हमारे स्मार्ट फोन्स पास में होते हैं, तब हम कम मुस्कुराते हैं।

जब हमारे पास स्मार्ट फोन्स होते हैं, तब हम कम मुस्कुराते हैं। क्यूंकि फोन्स काफी ज़्यादा व्याकुलता को उत्पन्न करते हैं। हो सकता है कि हम लोगों के आस-पास हों, लेकिन तब भी अपने फोन्स में व्यस्त हों।” यह तुषार गुप्ता नमक एक 21 वर्षीय छात्र ने कहा।

सामाजिक ताना-बाना कम होना

काफी हद तक इस परिणाम के लिए हमे युवा पीड़ी को दोष देना चाहिए। “मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन आज कल लोग सेल्फी लेने में इतना व्यस्त हैं की वे उस असली पल को एन्जॉय नहीं कर पाते। इतना ही नहीं, वे उस खीची हुई तस्वीर को तुरंत सोशल मीडिया पर साझा भी करना चाहते हैं। आपने महसूस किया होगा कि अगर लोगों के फोन का इंटरनेट भी चला जाये, तो वे क्रोधित हों जाते हैं।” यह प्रतिक्रिया कानपुर के एक युवा छात्र धवला पांडेय ने दी है।

मुस्कुराना अपनी सहमति देने जैसा है। यह दर्शाता है कि आप किसी दूसरे व्यक्ति से बात करने में इच्छुक हैं।

अगर कोई व्यक्ति ज्यादा बात करें, तो क्या हम उसे क्रोधी नहीं बोलते? लेकिन आपके स्मार्ट फोन्स आपको वही बना रहे हैं। जिस तरह अगर हमारे पास कुछ काम करने को नहीं होता है तो हम किसी किसी रूप में कुछ और ढूंढ ही लेते हैं। बिलकुल यही हिसाब हमारे फोन्स के साथ है। जब फोन की बैटरी खतम हों जाती है, डाटा काम नहीं करता, या कुछ और समस्या हों जाती है तब ही हम असल दुनिया से जुड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन लोगों से जुड़ने के लिए और मुस्कुराने के लिए हमे इन परिस्तिथियों की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

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