अगर ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष के हिसाब से देखा जाये तो “बहुत प्रसिद्ध होने की अवस्था या भाव” को स्टारडम के रूप में परिभाषित किया जाता है। और कैंब्रिज शब्दकोष में “किसी अभिनेता, गायक आदि होने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध होने का गुण” स्टारडम कहलाता है। अब मसला यह है की इन परिभाषाओं में तो कहीं भी लैंगिक भेदभाव की बात नहीं है। तो फिर बॉलीवुड इंडस्ट्री में हमेशा से ही क्यों पुरुष स्टारडम महिला स्टारडम से ज्यादा है? इस प्रश्न का उत्तर बॉलीवुड की कुछ अंधरुनी, अनदेखी, और कम गौर की जाने वाली बातों में मिल सकता है। आईये इसे समझने का प्रयास करते हैं।

मुख्य रूप से पुरुष प्रधान इंडस्ट्री

सिनेमा के इतहास का अगर एक दौरा किया जाये तो यह साफ़ हो जायेगा की बॉलीवुड मुख्य रूप से एक पुरुष उन्मुख इंडस्ट्री रही है। ऐसा नहीं है कि महिलाओं ने अपना योगदान इसकी नींव रखने में नहीं दिया है, लेकिन ज्यादातर जिक्र पुरुषों का ही है। इसी उन्मुखता को आगे लाकर और इसमें बढ़ोतरी कर, बॉलीवुड मुख्य रूप से अब एक पुरुष प्रधान इंडस्ट्री है। हमारे पास पुरुष निर्देशक और निर्माताओं के अलावा काफी कम महिला निर्देशक, निर्माता, आदि हैं। शायद यह एक कारण की पुरुषों का स्टारडम महिलाओं से ज्यादा है क्यूंकि पुरुषों का हमेशा इस इंडस्ट्री में उच्च हाथ रहा है।

पुरुष नजरिए से लिखी कहानियां

अगर आज कल के बदलते दृश्य को समझा जाये, तो इसके मुकाबले पहले की फ़िल्में हमेशा एक पुरुष के नज़रिये से लिखी जाती रही हैं। हालांकि आज भी यह पूरी तरह से खतम नहीं हुआ है, लेकिन जागरकता के कारण लोग बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। “बधाई हो” जैसी फ़िल्में आज-कल नए-नए मुद्दों को उठाकर रूढ़िवादियों को तोड़ने की कोशिश कर रहीं हैं। और “वीरे दी वेडिंग” जैसी फ़िल्में महिलाओं के नजरिये से अब सामने आ रही हैं।

पुरुष लीड के साथ ही महिलाओं का डेब्यू

यह सच है कि जब बॉलीवुड एक महिला अभिनेता को बढ़ावा देता है, तो यह हमेशा पुरुष प्रधान के साथ एक संदर्भ के रूप में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर दीपिका पादुकोण की फ़िल्में ले लीजिये। उन्हें ज्यादातर रणवीर सिंह जैसे मजबूत पुरुष कलाकार के साथ दर्शाया जाता है। यह अकेला किस्सा नहीं है। आप सलमान खान जैसी हस्ती और मज़बूत लीड के साथ डेज़ी शाह, जैकलीन फर्नॅंडेज़ को देख सकते हैं। जिससे साफ़ है की अभी तक हमारे पास ऐसी बहुत कम फ़िल्में है जिसमे महिलाएं बिना किसी पुरुष के लीड रोल्स में हों और उन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया हो।

महिलाएं सिर्फ फैशन लुक्स और स्टेटमेंट्स के लिए प्रसिद्ध

यह तो एक सामान्य वक्तव्य है कि महिला कलाकारों तक ज्यादातर उनके लुक्स, फैशन की समझ, आदि पर बात करने के लिए पंहुचा जाता है। जिससे लोग यह समझ बैठते हैं कि महिलाओं के अंदर इसके अलावा किसी भी बुद्धिमता वाले विषय पर बात करने के लिए कुछ नहीं होता। लेकिन, हमारे पास प्रियंका चोपड़ा, कंगना रनौत जैसी दिग्गज अभिनेत्रियां हैं जो सिर्फ अपनी प्रोफेशनल ज़िंदगी में व्यस्त नहीं हैं। वे समाज के मुद्दों पर टिप्पड़ी भी करती हैं और अपने वक्तव्यों से सबको प्रेरित भी करती हैं।

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