हम सभी जानते हैं कि एक महिला होने के कई पहलू हैं। लेकिन इनमें से कितने पहलू प्राकृतिक हैं? क्या सभी हमारे पितृसत्तात्मक समाज का नतीजा हैं? क्या महिलाओं को अपने लिए चुनने की स्वतंत्रता है? उन्हें उनके दिल की मानने व करने से क्या रोकता है?

नारीवाद से आया परिवर्तन

हाल के वर्षों में परिस्तिथि निश्चित रूप से बदल गई है, यह मानना हैं शैली चोपड़ा, शीदपीपल.टीवी, संस्थापक, का। टाइम्स लिटफेस्ट दिल्ली में एक पैनल में उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे आकर्षक चीज यह है कि अब महिलाएं खुद के लिए खड़ी हो रही हैं और आवाज़ उठा रही हैं। उन्होंने इस तथ्य को भी उजागर किया कि नारीवाद का हर किसी के लिए अलग-अलग अर्थ हैं, जो उनकी परिस्तिथियों एवं ज़िन्दगी पर निर्भर करता हैं। “नारीवाद एक विचार के रूप में विकसित हो रहा है। बस इसे संदर्भ और वास्तविकता से जोड़ना महत्वपूर्ण है।” चोपड़ा का मानना हैं।

चोपड़ा ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को सुपरविमन सिंड्रोम से छुटकारा पाना चाहिए। “आपको हर कोई पसंद करे, ये महत्वपूर्ण नहीं है। आप सभी को खुश नहीं कर सकते हैं और यह बिल्कुल ठीक है। ”

महिलाओं को चुप क्यों करवाया जाता है ?

दीपा नारायण, जिन्होंने हाल ही में एक पुस्तक लिखी है, चुप: ब्रेकिंग द साइलेंस ऑन इंडिया’स विमेन, ने कहा कि महिलाओं को मजबूरन चुप रहना पड़ता है और बिना सवाल किये चीज़ें थोप दी जाती हैं। दीपा का मानना हैं की उनमे से कई पुरुषों के आक्रामकता से भी डरती हैं क्योंकि हमारी सांस्कृतिक कंडीशनिंग में अबतक बदलाव नहीं आया है।

“आपको हर कोई पसंद करे, ये महत्वपूर्ण नहीं है। आप सभी को खुश नहीं कर सकते हैं और यह बिल्कुल ठीक है। ” –  शैली चोपड़ा

महिलाएं के भविष्य के लिए विचारधारा में परिवर्तन

लेखिका अनुजा चौहान ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं और उनके भविष्य के बारे में विचारधारा बदलाव ज़रूरी है। अनुजा का मानना है कि समाज को एक महिला के विवाह की चिंता के बजाय उसे वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनाने पर ध्यान देना चाहिए, तभी उसका भविष्य वास्तविक रूप से सही राह पर होगा।

उन्होंने इस तथ्य पर भी बोला कि भारतीय महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनायीं है जिसके कारण भारतीयों के पास कई बेहतरीन महिला रॉल मॉडल हैं और यह ऐसा कुछ है जो हमारे देश को अलग बनाता है।

#MeTooIndia और भारतीय पुरुष

#MeToo आंदोलन ने हजारों महिलाओं को बोलने की आवाज एवं हिम्मत दी है। लेखिका मेघना पंत ने कहा, “यह पहली बार था जब महिलाओं को सुना जा रहा था और उनके बोलने पर निर्णय नहीं लिया जा रहा था। पहली बार, पुरुष भयभीत थे। वह अपने व्यवहार की जांच कर रहे थे।”

“पितृसत्ता पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए अनुचित है। नारीवाद समाज में रहने वाले पुरुषो एवं महिलाओं को मुक्त करता है। दोनों लिंगों का एक प्रणाली के खिलाफ लड़ना ही नारीवाद है” – मेघना पंत

चारों पैनलिस्ट इस विचार पर सहमत थे कि लिंग-समान समाज बनाने में माताओं की ज़िम्मेदारी एवं भूमिका बहुत बड़ी है। उनका मानना ​​है कि सोच में परिवर्तन छोटी उम्र में ही आता है और एक लिंग-समान समाज के निर्माण में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।

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