अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पहल के हिस्से के रूप में शीदपीपल ने भारत में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर उनके विचारों को जानने के लिए “बीडी फाउंडेशन’ की सारिका गुप्ता भट्टाचार्य से बात की। बीडी फाउंडेशन एक वैश्विक विविधता सलाहकार है, जो एक समावेशी दुनिया के विकास की दिशा में काम कर रहा है।

भारत में महिलाओं को किन मुख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के सामने चुनौतियां समान हैं – जैसे सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच, आर्थिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह। नीतिगत स्तर पर, भारत हाल के दिनों में कई सीमाओं को आगे बढ़ाने में सक्षम रहा है – लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अभी भी मानसिकता और विश्वास है, जिसे बदलने की आवश्यकता है। अभी भी महिलाओं को दूसरे वर्ग के रूप में माना जाता है। यह विचार शहरी और ग्रामीण, दोनों जगह की महिलाओं के लिए सामान है।

अगली पीढ़ी की महिलाओं के लिए आपकी क्या उम्मीदें और सपने हैं?

जिस दिन हमें महिला दिवस के रूप में वर्ष का एक विशिष्ट दिन मनाने की आवश्यकता नहीं होगी, और हमारी उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए या चुनौतियों को उजागर करने के लिए किसी ख़ास दिन की ज़रूरत नहीं होगी, उस दिन मुझे पता चल जाएगा कि महिलाएं अब मुख्यधारा का हिस्सा हैं – वे वास्तव में शामिल हैं।

महिलाएं अन्य महिलाओं का समर्थन कैसे कर सकती हैं?

मैं प्रत्येक महिला से आग्रह करूंगी कि वे अपनी पेशेवर और व्यक्तिगत जिंदगी के साथ एक अन्य महिला या एक युवा लड़की का मार्गदर्शन करें और उनकी आकांक्षाओं को प्राप्त करने में उनकी मदद करें। इसके अलावा, यह बहुत अच्छा है जब हम अन्य महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाते हैं और उन्हें खुश करते हैं – जो सही मायने में महिलाओं का समर्थन करने वाली बात है।

पिछले एक वर्ष में ऐसा कौन सा क्षण है जो आपके अनुसार महिलाओं के लिए सबसे अधिक सशक्त रहा है?

सबरीमाला का फैसला, जब महिलाएं एक दीवार बनाकर एक दूसरे के साथ खड़ी थीं। यह एक ऐसा क्षण था जब दुनिया ने इस बात पर ध्यान दिया कि महिलाएं, जब वे एक साथ आती हैं और बोलती हैं, तो पुरानी मान्यताएं बदल सकती हैं और नीतियां भी बदल सकती हैं।

महिलाओं को सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए सरकारों को किन महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने की आवश्यकता है?

जबकि नीतियां और कानून व्यवस्था महत्वपूर्ण है, लेकिन यह साबित हो गया है कि प्रगतिशील और विकसित राष्ट्रों में लिंग आधारित हिंसा कम है। मैं सरकार से आग्रह करूंगी कि वे बड़े पैमाने पर लिंग संवेदीकरण सत्र करना, स्कूलों में समावेशी प्रशिक्षण करना, लड़कियों के लिए शिक्षा, स्वच्छता और नौकरी के अवसर, आदि की तेज़ी से शुरुआत करें।

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