हैदराबाद की रहने वाले गौहर सुल्ताना ने कम उम्र में लड़कों के साथ क्रिकेट खेलकर रूढ़ियों को तोड़ा है। उनका अपने जीवन में कभी हार नहीं मानने का फार्मूला उन्हें आज के युवाओं का यूथ आइकॉन बनाता है। असफलताओं और निराशाओं ने ही उन्हें और मजबूत बनाया है । वह अपनी   माँ को ही अपनी यात्रा का श्रेय देती है। आइए नजर डालते हैं कि कैसे वह एक अच्छी बल्लेबाज़ बनी और कोसे समय के साथ उनका स्पिन समय के साथ बेहतर हुआ ।

क्रिकेट ही क्यों ?

मेरे चाचा को क्रिकेट बहुत पसंद था और वह बहुत उत्सुकता के साथ टेलीविज़न पर क्रिकेट देखते थे और मुझे उनके साथ क्रिकेट देखने में बहुत मज़ा आता था । मैं अपनी कॉलोनी में लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती थी। एक दिन, एक लड़के के माता-पिता ने मुझे समर कैंप में जाने के लिए कहा। उनके बेटा और मैं दोनों कैंप में क्रिकेट खेलते थे और यही से खेल के साथ मेरी यात्रा की शुरुआत  हुई। मैंने बचपन से क्रिकेट खेला है इसलिए वो मुझे हमेशा से ही पसंद रहा है ।

क्रिकेट का जूनून

मैं अपने सारे काम बाएं हाथ से करती थी जो मेरे लिए सबसे बड़ा फायदा था। कैंप में शामिल होने के कुछ महीने बाद मुझे लेफ्ट आर्म स्पिनर होने के रूप में अंडर -16 स्टेट टीम में चुना गया था। मुझे खेल खेलने में मजा आता था। मैंने कभी नहीं सोचा था की मै कभी क्रिकेट में अपना करियर बनाउंगी क्योंकि मैं इस बात से अनजान थी कि देश में महिला क्रिकेट मौजूद है।

मेरे कोच अनीता मैम, गणेश सर, पुरी डि और एक जानी-मानी हस्ती वेंकटपति राजू सर मेरी गेंदबाजी से बहुत प्रभावित थे और मुझे विश्वास था कि अगर मैं ऐसे ही खेलती रही तो मैं एक उज्ज्वल भविष्य की आशा कर सकती हूं, जो की क्रिकेट से मुझे मिल सकता है।

प्रेरणा

मेरी माँ हमेशा से मेरा बहुत बड़ा सपोर्ट सिस्टम रही हैं। वह मुझे खेल खेलते रहने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करती रही है और हमेशा मेरे जुनून को पहचानने में सफल रही है। एक समय आया जब मेरे कोच ने भी उन्हें फोन किया और उन्हें बताया कि मै अभी बहुत आगे जा सकती हूँ । शुरुआत में, बहुत सी मुश्किलें आयी, लेकिन मेरी माँ हमेशा मेरे साथ कड़ी रही।

चुनोतियाँ

मुझे अपनी बॉलिंग और फील्डिंग को सुधरने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी और मैं तब तक खेलती रही जब तक मै अपना सबसे बेस्ट देने के काबिल नहीं हुई । मैंने इस खेल से हमेशा कुछ सीखा है ।

देश के लिए खेलना

सच कहूं तो मैंने क्रिकेट सिर्फ इसलिए खेलना शुरू किया, क्योंकि मुझे क्रिकेट से बेहद प्यार था। मैंने स्टेट लेवल पर अच्छा प्रदर्शन किया और मुझे 2005 में भारत जूनियर कैंप के लिए खेलने का मौका मिला। यह ऐसा कुछ था जिसकी मुझे कभी उम्मीद नहीं थी और मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी। मैंने टीम में शामिल होकर पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन फिर एक मोड़ आया। मैं बस में नहीं जा सकती थी क्योंकि मैं नाबालिग थी और मेरे पासपोर्ट को लेकर भी एक समस्या थी। यह तब था जब मैंने फैसला किया कि मैं उठूंगी, इसका सामना करूंगी और आगे बढ़ूंगी । मैंने फैसला किया कि मैं जो कुछ भी करूंगी और सीनियर टीम तक ज़रूर पहुंचूंगी । मैंने कड़ी मेहनत की और आखिरकार अपने सपने को जीया जब मैंने 2008 में आयोजित एशिया कप में नीली जर्सी पहनकर अपने करियर की शुरुआत की।

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