महिलाओं के खिलाफ कई अपराधों में से एक है स्टॉकिंग, जो लगातार बढ़ता जा रहा है. कई बहसें हुई हैं कि कैसे अपराध के रूप में, स्टॉकिंग पर भी नियंत्रण ज़रूरी है. देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, इसे एक गैर-ज़मानती अपराध के रूप में स्थापित करने की एक तत्काल आवश्यकता है.

पिछले हफ्ते, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में एक 18 वर्षीय लड़की को उसके स्टॉकर ने आग लगा दी. दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज करवा रही किशोरी ने रविवार को दम तोड़ दिया. स्टॉकर, मनोज सिंह उर्फ ​​बंटी (31), पौड़ी के गेहड़ गांव का एक कैब ड्राइवर है, और वह पांच साल से उसे स्टॉक रहा था. लगभग 77 प्रतिशत झुलसने वाली इस लड़की ने पुरुषों की दुष्प्रवृत्तियों के कारण अपना जीवन खो दिया. निधन के बाद, लड़की के चाचा ने कहा, “हम हत्यारे को मृत्युदंड देना चाहते हैं. सजा ऐसी होनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति इस तरह का अपराध करने की सोचे भी नहीं. हम चाहते है कि हत्यारे को फांसी दी जाए.”

सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खत्म करना ज़रुरी है

2013 के आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश की धारा 354 डी के अनुसार, स्टॉकिंग का अर्थ है, “एक महिला को फॉलो करना और महिला द्वारा घृणा के स्पष्ट संकेत के बावजूद बार-बार व्यक्तिगत संपर्क करना; इंटरनेट, ईमेल या इलेक्ट्रॉनिक संचार के रूप में भी संपर्क करना.”

ज्यादातर बहस इस मुद्दे पर हैं कि महिलाएँ शुरू में शिकायत नहीं करती हैं, जो गलत है. उन्हें डर रोक देता है. पर क्या कभी महिलाओं को आश्वासन मिला है कि उन्हें न्याय दिया जाएगा?

स्टॉकिंग के केस में बढ़ोतरी

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 7,190 मामले दर्ज किए गए. और सजा होने की दर 26.6 प्रतिशत है. जहां महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 1,587 मामले दर्ज किए गए, वहीं दिल्ली में 835 ऐसे मामले दर्ज किए गए. दादरा और नगर हवेली और लक्षद्वीप ऐसे दो केंद्र शासित प्रदेश हैं, जहाँ 2014 -16 में कोई केस दर्ज़ नहीं हुआ.

इस सब में कानून कहां खड़ा है?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक, आरोप लगाने वाले 80 फीसदी लोगों को चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही ज़मानत दे दी जाती है, जो पीड़ित महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है.

वकील अरुशी अरोड़ा कहती हैं, “स्टॉकिंग एक दंडनीय अपराध है. पहली बार दोष लगने पर तीन साल की कैद और जुर्माना है, लेकिन यह जमानती है. दूसरी बार, सजा पांच साल और जुर्माना है, और इसके अगली बार गैर-जमानती कैद.”

इस वर्ष महिला दिवस पर, सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में स्टॉकिंग को गैर-जमानती अपराध घोषित करने की अपील की.

 “डर के कारण, लगभग सभी महिलाएं रात को अकेले बहार निकलना पसंद नहीं करती हैं. हालांकि, छोटे शहरों की तुलना में बड़े शहरों में अधिक जागरूकता और कानून का डर है.” – गुड़गांव निवासी आरज़ू गिल

महिलाओं का पक्ष

“आज भी, पुरुषों का मानना ​​है कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने और उन्हें नुकसान पहुंचाने के बाद वह बच सकते हैं. उत्तराखंड की घटना यह साबित करती है कि यह देश महिलाओं के लिए खतरनाक है”, प्रभलीन माल्ही, उत्तराखंड.

गुड़गांव निवासी आरज़ू गिल कहती हैं, ” डर के कारण, लगभग सभी महिलाएं रात को अकेले बहार निकलना पसंद नहीं करती हैं. हालांकि, छोटे शहरों की तुलना में बड़े शहरों में अधिक जागरूकता और कानून का डर है.”

हल्द्वानी निवासी अपूर्व जोशी को लगता है कि लोग ‘स्टॉकिंग’ शब्द को नहीं समझते हैं। “स्टॉकिंग रोज़ की ही बात हो गयी है, और यह मेरे अकेले की बात नहीं है. मैं अपने दोपहिया वाहन पर यात्रा करती हूं और किशोर लड़के, टिप्पणियां पास करते हैं. हम ही लोगो ने इसे सामान्यीकृत किया है.”

मनोचिकित्सक जागृति ग्रोवर कहती हैं, पुरुष सभ्य तरीके से रिजेक्शन नहीं लेते इसलिए स्टॉकिंग होती है. “जब मैं राजधानी में एनजीओ में काम कर रही थी, तब कई मामले सामने आए. मैं वर्तमान में उत्तराखंड के एक छोटे से शहर में काम कर रही हूं और मैं एक ही पैटर्न देखती हूं. किशोर लड़कियां मानसिक और भावनात्मक रूप से इतनी प्रभावित होती हैं कि वे जीवन भर परेशान रहती हैं. ”

कैसे करे शिकायत दर्ज, बिना थाने जाए

अब, पीछा करने और अन्य अपराधों के मामलों में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा है. महिलाओं के पास राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) पर शिकायत दर्ज करने का अधिकार और मंच है. आयोग पुलिस के साथ मामले की तेह तक जाती है.

कोई भी महिला, देश के किसी भी हिस्से से, शिकायत को दर्ज करा सकती है. आयोग, शिकायत मिलने पर, पुलिस को जांच करने के लिए कहता है. कुछ मामलों में, आयोग एक जांच समिति बनाता है, गवाहों की जांच करता है, और सबूत इकट्ठा करता है.

यही सही समय है, इस मुद्दे को गंभीरता से लेना का. ज़मानत केवल पीड़ित महिलाओं की चुप्पी को जन्म देता है. यह न केवल यौन शिकारियों को मदद देना है, बल्कि अन्य महिलाओं को हतोत्साहित करना है जो मदद चाहती हैं.

(यह आर्टिकल भावना बिश्ट ने अंग्रेजी में लिखा है)

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