भीकाजी कामा ने भारत के पहले झंडे को दुनिया के सामने लेकर आयी जिसके बाद उस झंडे को राष्ट्रीय ध्वज में विकसित किया गया जैसा कि हम आज जानते हैं। इसके अलावा, वह निर्वासित होने के बाद भी राष्ट्र के लिए सेवा और संघर्ष करती रही। भीकाजी कामा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई अनसुने नायकों में से एक हैं। कामा एक योद्धा, एक सेनानी थी जिन्होंने संघर्ष के शुरुआती दिनों में ब्रिटिश शासन का विरोध किया था। हालाँकि, बहुत सारी इतिहास की किताबों में शायद उनका ज़िक्र न हो। उनके 158 वें जन्मदिन के अवसर पर, आइये उस महिला से मिलते हैं, जिसने न केवल भारतीय स्वतंत्रता के लिए, बल्कि सभी बाधाओं के खिलाफ लैंगिक समानता के लिए भी संघर्ष किया।

भारत का पहला झंडा

कामा को पहले ध्वज को डिजाइन करने और अनावरण करने के लिए लोकप्रिय रूप से जाना जाता है। वर्तमान भारतीय ध्वज उसी ध्वज के डिज़ाइन से बनाया गया है । उन्होंने इसे “भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज” कहा, यह वही तिरंगा झंडा था जैसा कि हम अभी जानते हैं, लेकिन उनके  लिए, इसका मतलब कुछ और ही है।

हरा रंग इस्लाम के लिए, हिंदू के लिए पीला और बौद्ध धर्म के लिए लाल था। इसमें एक अर्धचंद्राकार चंद्रमा, फिर से इस्लाम के लिए एक संलयन और हिंदू धर्म के लिए एक सूर्य शामिल था। यह कामा का झंडा था, और अभी भी महत्वपूर्ण है यह धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव की दृढ़ता के बारे में बात करता है। स्वतंत्र भारत के लिए कामा की दृष्टि सभी धर्मों के लिए शांति से सह-अस्तित्व में रहने की थी।

लैंगिक समानता के लिए उनके प्रयास

उनका मानना ​​था कि जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, भारतीय महिलाएं भी अपने सभी अधिकारों को प्राप्त करेंगी।

भीकाजी कामा: विरासत

अपने जीवन के अंत में, भीकाजी निर्वासन (एक्साइल) में थी। वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और अंग्रेजों ने 1935 में नवंबर में उन्हें बॉम्बे वापस आने की अनुमति दे दी। आखिरकार नौ महीने बाद उनका निधन हो गया। भीकाजी ने अपनी सारी संपत्ति एक अनाथालय को दे दी।

भीकाजी कामा उन लोगों की यादों में रहती हैं, जिनकी उन्होंने मदद की। वह न केवल स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दिनों की एक महत्वपूर्ण नेता थीं, बल्कि इसमें शामिल बहुत कम महिलाओं में से एक थीं। स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अपार है। भले ही उन्होंने निर्वासन में कई साल बिताए हों, लेकिन उन्होंने  वह सब कुछ किया जो वह भारत की स्वतंत्रता के लिए कर सकती थी। हम ऐसी महान महिलाओं के योगदान को सलाम करते हैं!

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