असम कहने को तो भारत के उत्तर -पूर्वी में हैं पर यहाँ की महिलाओं ने खूब कमाल कर रखा है। आज हम आपको मिलवाते है असम की एक ऐसी बहादुर महिला पुलिसकर्मी से जिन्होंने 16 से अधिक आतंकवादियों को अकेले मार गिराया और असम में 15 महीनों में कई लोगों को गिरफ्तार किया। आज हम आपको मिलवाते है असम की आईपीएस संजुक्ता पराशर से। फिलहाल वह चार साल के लिए 2017 से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) में पुलिस अधीक्षक के रूप में नियुक्त है । पराशर ने 2008 में अपनी यात्रा शुरू की जब उन्होंने माकुम के सहायक कमांडेंट के रूप में कमान संभाली।

2006 बैच के एक अधिकारी, पराशर ने मीडिया के साथ बातचीत की। उन्होंने शीदपीपल.टीवी  के साथ इस विशेष इंटरव्यू में भारतीय पुलिस में  अपनी यात्रा और विचारों के बारे में बताया है। आगे पढ़िए क्योंकि उन्होंने अपनी यात्रा में अब तक के सबसे कठिन मामले का भी खुलासा किया है।

पुलिस में जाने की प्रेरणा

मैं असम में पली-बढ़ी हूं। जब तक मैंने बारहवीं कक्षा पास नहीं की तब तक वह असम में थी लेकिन मैं वास्तव में दिल्ली में बढ़ी हूं। दिल्ली विश्वविद्यालय में मेरे अंडरग्रेजुएशन के पहले तीन साल सबसे अच्छे थे। मुझे अपने बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला और जो मैं करने में सक्षम थी मुझे पता चला। मैंने स्वतंत्र होना सीखा। मैंने खुद की देखभाल करना सीखा और साथ ही दूसरों की देखभाल करना भी सीखा। लेकिन उन सभी वर्षों में, मैंने कभी खुद को पुलिस अधिकारी बनने की कल्पना नहीं की।

पुलिस अफसर बनने की सोच

मैं 23 साल की थी जब मैंने आखिरकार यूपीएससी परीक्षा में बैठने का मन बनाया। मुझे यकीन है कि आप जानते हैं कि हम वास्तव में आईपीएस में पुलिस में शामिल होने का निर्णय नहीं लेते हैं। यह सेवा वह है जिसे हम रैंक, बहादुरी, जाति, राज्य में रिक्तियों आदि जैसे पैमानों  के आधार पर एक ही परीक्षा में पास करने के बाद सोचते है।

हाँ मै मानती हूँ की महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले दुगना काम करना पड़ता है । यह एक कहावत है कि हमारी संस्कृति में पुरुष प्रधान है पर उनमे ज़्यादा काम करने की शक्ति के कारण महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दो गुना अच्छा माना जाता है। – संजुक्ता पराशर

सबसे मुश्किल केस

एक व्यवसायी की हत्या का मामला जिसमे एक व्यवसायी का एक गिरोह द्वारा अपहरण कर लिया गया था। उस केस में बंदूक चलाने वाले, हिटमैन और कॉल गर्ल्स शामिल थी । उसमे यह पता लगाना सबसे मुश्किल था क्योंकि इसके बारे में हमे कुछ नहीं पता था। इस केस में फर्जी नामों में सिम कार्ड जारी करने का खतरा एक बाधा थी जिसने हमारी सारी शक्ति और बुद्धि को खत्म कर दिया था। इससे भी कठिन बात यह थी कि हमारी पूरी कोशिशों के बावजूद, हमने उस व्यक्ति को खो दिया जिसका अपहरण कर लिया गया था। उनके परिवार से बात करते हुए, अभी भी मुझे बहुत परेशानी होती है क्योंकि यह अभी भी मुझे एक  बड़ी असफलता की तरह महसूस होता है।

महिलाओं के लिए ज़्यादा मेहनत

हाँ मै मानती हूँ की महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले दुगना काम करना पड़ता है । यह एक कहावत है कि हमारी संस्कृति में पुरुष प्रधान है पर उनमे ज़्यादा काम करने की शक्ति के कारण महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दो गुना अच्छा माना जाता है।

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