देश के महान फिल्म निर्माताओं में से एक हैं-सत्यजीत रे. रे की पहली फिल्म ‘पाथर पांचाली’ 11 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीती थी.

4 दशक के फिल्म निर्माण के करियर में, रे ने खुद को कभी एक विधा या शैली तक सीमित नहीं रखा. उनकी फिल्में मानवीय रिश्तों से अलग हैं, जैसे रोमांचकारी(फेलुदा), रोमांस(अपू), व्यंग्य(हीरक राजार देश ), सरल शहर जीवन(महानगर), आदि.

रे की महिला किरदार सिर्फ रसोई तक ही सीमित नहीं

उनकी ज़्यादातर फिल्में सशक्त महिला पात्रों पर है. रे मज़बूत व खूबसूरत चित्रण में माहिर है. उनकी महिला किरदार बहुत वास्तविक होती है. यह महिलाएं सिर्फ रसोई तक ही सीमित नहीं, बल्कि उनके पास अपनी भावनाएं है, उनके संघर्ष भी और अपनी यौन इच्छाओं को व्यक्त करने का साहस भी.

रे ने एक ऐसे समाज का चित्रण किया, जहाँ महिलाओं को चुप कराया जाता है, उनके अनुभव और अंतर्दृष्टि को खारिज किया जाता है. उनकी फिल्में महिलाओं की स्थिति और अनुभव को स्पष्ट रूप से दर्शाती है.

सत्यजीत रे की 5 महिला किरदार जो सशक्त और स्वतंत्र थी, और हमारे दिलों पर एक छाप छोड़ गईं है:

दयामोई (देवी)

प्रोवातकुमार मुखोपाध्याय की कहानी पर आधारित, ‘देवी’ फिल्म 19वीं सदी के ग्रामीण बंगाल में रहने वाली 17 वर्षीय दयामोई की कहानी है. फिल्म में दयामोई के अंधे पिता ने उसे देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया. दयामोई का किरदार शमरीला टैगोर ने बखूबी निभाया है, जो बाद में अपने ऊपर लगाए गए इस देवी-रूपी अवतार को तोड़ने में असमर्थ है.

दयामोई की तरह, आज भी महिलाएं, परिवार, परंपरा, संस्कृति और सम्मान के नाम पर अन्याय सहती है. हिंदू पितृसत्तात्मक परंपराओं और सामान्य महिलाओं पर इसके प्रभाव पर बनी यह फिल्म बताई है कि भारत अभी भी अज्ञानता और अंधविश्वास से परिपूर्ण पितृसत्तात्मक समाज है.

चारुलता (चारुलता)

1964 में रिलीज़ हुई, ‘चारुलता’ रबींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास, नास्तनिरह (द ब्रोकी नेस्ट) पर आधारित है. यह एक अकेली गृहिणी की कहानी है, जो ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीती है लेकिन लेकिन सफल पति होने के बावजूद अकेली है. चारु बंगाल में कई महिलाओं की कहानी बताती है, जो खुश लगटी है, लेकिन अकेलेपन से जूझ रही थीं. चारु का किरदार इस छिपे अकेलेपन, और ऐसी महिलाओं की इच्छाओं को सामने लाया है.

चारुलता (माधबी मुख़र्जी) की असंतुष्टि, और उसकी शादी में दरारें, उसके पति के चचेरे भाई अमाल के आगमन के साथ और अच्छे से व्यक्त हो गयी. अमल चारु में अव्यक्त इच्छाओं को जागृत करता है. रे ने चारु का चरित्र देवी जैसा नहीं बल्कि इंसान है जिसमें खामियां है और दुर्लभता भी.

उम्मीद के विपरीत, चारु न केवल अपनी इच्छाओं और अकेलेपन को स्वीकार करती है, बल्कि उनका साहस एक ऐसे समाज के लिए चुनौती है जो महिलाओं को नहीं सुनता. फिल्म चारुलता की दुविधा और शादी में असंतोष व उसकी भावनात्मक भावनाओं और रिश्तों के भ्रम को दर्शाती है.

दुर्गा (पाथर पांचाली)

1955 में रिलीज़ हुई, पाथेर पांचाली रे का पहला निर्देशन था. इसी नाम के विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित, फिल्म अप्पू और उसकी बड़ी बहन दुर्गा के बचपन पर है, और गरीबी की कठोर वास्तविकता को सामने लाती है. रे के पाथेर पांचाली ने भारतीय सिनेमा को कुछ ऐसी महिलाएँ दी हैं जो क्लासिक हैं, वे समकालीन हैं।

कहानी दुर्गा के भाई के इर्द-गिर्द है, लेकिन दुर्गा की दृढ़ता और साहस कई बाधाओं को दूर करने में मदद करता हैं. वह अपने भाई की देखभाल करती है, कर्तव्यनिष्ठ और सुरक्षात्मक है, लेकिन नायक के बावजूद उसका चरित्र छिपता नहीं है. तीन भाग की इस फिल्म श्रृंखला में, दुर्गा (उमा दासगुप्ता) को जिज्ञासु, देखभाल करने वाली और प्रकृति-प्रेमी के रूप में चित्रित किया गया है.

आरती (महानगर)

1963 में रिलीज़ हुई, महानगर (द बिग सिटी) नारीवाद का एक अहम पाठ है. जब मध्यवर्गीय बंगाली परिवार जबरदस्त बदलावों के दौर से गुजर रहे थे, फिल्म में महिलाओं द्वारा उठाए गए पहले अनिश्चित कदम को दिखाया गया. उन्होंने दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की.

आरती (माधबी मुख़र्जी) एक पारंपरिक मध्यम वर्गीय बंगाली घराने से ताल्लुक रखती है, जो अपने पति की नौकरी छूटने के बाद अपने परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए एक गृहिणी से कामकाजी पत्नी के रूप में तब्दील हो जाती है.

फिल्म में, रे ने शानदार ढंग से आरती द्वारा हासिल की गई स्वतंत्रता की पहली भावना को दर्शाया. शहर के साथ आरती की मुठभेड़ और वो परिवर्तन जिनका वह आनंद लेती है, बिना आंतरिक चरित्र को बदले.

बिमला (घरे बाइरे)

रवींद्रनाथ टैगोर के इसी नाम के उपन्यास से प्रेरित, फिल्म एक अनपढ़ गृहिणी की इच्छाओं को भी दर्शाती है. बिमला (स्वातिलेखा चटर्जी) को घरेलू जीवन के बाहर की दुनिया की खोज के लिए प्रोत्साहित किया गया है. फिल्म की कहानी बिमला, एक स्वदेशी नेता और एक उदार के बीच “लव ट्राइंगल “पर है.

रे हमें इस फिल्म में एक वास्तविक चरित्र प्रदान करते हैं, एक डरपोक गृहिणी जो बाहर की दुनिया का सामना करने के बाद खुद को बेहतर समझती है. उसकी आत्म-खोज उसके पति द्वारा प्रोत्साहित की जाती है.

सत्यजीत रे ने भारतीय सिनेमा को कुछ ऐसी महिलाएँ दी हैं जो क्लासिक हैं और समकालीन भी.

(Pics by Youtube and NDT)

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