2018 कानून के लिए और हमारे लिए बदलाव का प्रतीक रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कुछ प्रगतिशील फैसले लिए जो समानता, दृष्टिकोण और सशक्तिकरण के लिए एहम साबित हुए.

चलिए इन फैसलों को एक बार फिर से जानते है, कैसे यह साल न्याय और प्रेम के लिए सकरात्मक रहा:

धारा 377 पर प्रतिबन्ध

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर सदियों पुराने प्रतिबंध को हटाया और कहा, “हमें सोच को बदल कर, सभी नागरिकों को सशक्त बनाना ज़रूरी है” 6 सितंबर को ऐतिहासिक फैसला आया, जब SC ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द कर दिया जिसके तहत समलैंगिकता आपराधिक था. इस फैसले के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ी जा रही थी. कोर्ट का समलैंगिकता पर अप्राद्यिक धरा को रद्द करना और व्यक्तियों के अधिकारों को बनाए रखना, हमारी कानून मै आस्था बनाता है.

अडल्टरी अब अपराध नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 ए के तहत अडल्टरी पर कानून को रद्द करने का फैसला किया. 150-वर्षीय कानून एक विवाहित महिला के पुरुष प्रेमी को अफेयर के लिए सजा देता था, न कि महिला को. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानून को असंवैधानिक बना दिया जाए क्योंकि इससे एक आदमी को दूसरे आदमी के खिलाफ आरोप लगाने की अनुमति मिलती है जिसके साथ उसकी पत्नी ने अडल्टरी की.

सबरीमाला फैसला

केरल के प्रतिष्ठित मंदिर- सबरीमाला को लेकर, सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की, “भक्ति में लैंगिक भेदभाव नहीं किया जा सकता है” अदालत ने 10 और 50 साल की उम्र के बीच की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने से रोकने वाला प्रतिबंध हटा दिया. हालांकि, जब से फैसला सुनाया गया है, स्थानीय पुलिस और आदिवासियों का विरोध जारी है.

ट्रिपल तलाक संवैधानिक नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पुरुषों द्वारा ‘तत्काल तलाक’ की प्रथा पर रोक लगाई. तत्काल ट्रिपल तालाक अवैध हो गया क्यूंकि ट्रिपल तालक की प्रथा ने मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया.

आधार कार्ड पर फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को फैसला सुनाया कि आधार लिंकिंग अनिवार्य है. मगर बैंक और टेलीकॉम कंपनियां लोगों को बैंक खाते और मोबाइल नंबर को आधार से लिंक करने के लिए नहीं कह सकती हैं, यह असंवैधानिक है.

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता आएगी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग न्यायिक कार्यवाहियों में और अधिक पारदर्शिता लाएगी और “जनता के जानने के अधिकार” को प्रभावित करेगी.

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से देश की प्रगति में काफी योगदान होगा और बदलाव आएगा , ऐसी उम्मीद करते है हम!

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