जब हम बड़े हो रहें होते हैं, हमें ये सिखाया जाता कि घर में आने वाले हर रिश्तेदार या परिवार वाले का सम्मान करना है या आशीर्वाद लेना है। भारत में लड़कियों को ये हिदायत दी जाती है कि उन्हें रात में घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए या काम नहीं करना चाहिए। असलियत में आधे से ज्यादा बलात्कार के केसों में गुनहगार को लड़की जानती है। यानी कि वो परिवार वाले होते है फिर रिश्तेदार।

आज मैं आपको अपने बारे में बताती हूँ। शायद इस से निकलने के लिए मुझे बहुत समय लगा, पर आज मैं एक शशक्त लड़की हूँ, आत्मविश्वास है जिसके आधार पर मैं ये बात आपको बता रही हूँ। 14 साल की उम्र में जब एक लड़की सातवी कक्षा में होती है, अच्छे अंक लाने की कोशिश करती है और खेलती कूदती है, वहाँ मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी बात हुई, जिसने दुनिया देखना का मेरा नज़रिया बदल दिया।

14 साल की उम्र में जब एक लड़की सातवी कक्षा में होती है, अच्छे अंक लाने की कोशिश करती है और खेलती कूदती है, वहाँ मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी बात हुई, जिसने दुनिया देखना का मेरा नज़रिया बदल दिया।

हर रिश्तेदार की तरह मेरे एक चाचा जो बचपन से मेरे काफ़ी करीब थे, हर समय मुझे चिप्स या चॉकलेट देते जब भी वो मुझसे मिलते। मैं खुशी खुशी लेती और उनसे आगे मिलने की राह देखती। धीरे धीरे जैसी बड़ी हुई, उनसे मिलना कम हुआ, पर वो आते ज़रूर थे, वही सब लेके। कभी उनकी बेटी के साथ खेलती तो कभी उनके साथ बाहर खाने जाते। उस दिन जब माँ सो रही थीं और मैं पढ़ रही थी, वो आये और उन्होंने मुझे अपनी ओर खींचा, यहाँ तक बात तो फिर भी सहनीय थी, पर आगे उन्होंने मेरा मुँह बंद किया और मुझे दबोचने की कोशिश की।

जितना तेज़ हो सके मैं भागी, बाथरूम में खुद को बंद किया, शावर चलाया और सोचा कि ये क्या हुआ। हाँ मुझे ये तो पता था कि मेरे साथ ग़लत हुआ पर मैं इस बात से डर गई थी कि आखिर मैं बाकी दिन उनके साथ कैसे गुज़ारूँगी, क्या माँ को बताना चाहिए, क्या वो ये बात सह पाएंगी, क्या उन्हें अजीब लगेगा? इसी डर के साथ अगले दो दिन गुज़रे जहाँ ऐसी बात फिरसे हुई।

इस बार जब मैंने ये बात अपने परिवार वालो को बताई तो उन्होंने इस बात को समझा ज़रूर पर कोई कठोर बरताव नहीं किया। आज भी वो मेरे घर में आते है, आज भी वो चिप्स और चॉकलेट लाते हैं। पर इस बार मैंने अपने आप को मन से शशक्त बनाया है। इस बार अगर मेरे साथ कुछ ग़लत हुआ तो मैं कठोर कदम ख़ुद उठा सकती हूँ।

आप सबको ये बताना चाहती हूँ, की मैं समझती हूँ, अगर आप इस से गुजरे हो या या आपके साथ ऐसा हुआ हो, पर इस बार आपको पता है आपको क्या करना है। आप पेहले कुछ नहीं कर पाए क्योंकि आप मजबूर थे, ये भी समझती हूँ, पर इस बार आपके साथ हम हैं, सब हैं। कदम उठाइए और दूसरों के लिए प्रेरणा बनिये।

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