हिंदी फिल्म जगत- बॉलीवुड, बच्चे बूढ़े सब को लुभाता है. कुछ लोग नाटक या एक्शन देखना पसंद कर सकते हैं, तो कुछ लोग रोमांस और हास्य. लेकिन हम उन महिलाओं को नहीं भूल सकते, जिन्होंने कुछ यादगार किरदार निभाए और अपने कुछ क़दमों से समाज की सोच बदली.

जानते है 5 भारतीय अभिनेत्रियां के बारें में, जिन्होंने समाज की दकियानूसी सोच और पित्तृसत्ता को चुनौती दी. अपने काम और अपने आप पर विश्वास बनाए रखा, और बेहतरीन प्रदर्शन किया:

कंगना रनौत

सभी बाधाओं के खिलाफ, समाज में एक महिला की दुर्बल स्थिति को समाप्त करने वाली एक महान कलाकार है, कंगना. कंगना ने क्वीन फिल्म में रानी के किरदार में अकेले अपने हनीमून पर जाने का साहसिक निर्णय लिया, क्या यह अति उत्तम नहीं? ऐसी भूमिकाओं की उनकी पसंद उनकी अपनी ज़िन्दगी से ही आई है. कंगना एक अनचाही बालिका थी और उसके माता-पिता खुश नहीं थे. कंगना समाज की इस बात से सहमत नहीं है की एक लड़का लड़की से बेहतर होता है. कंगना सभी को अपने सपनों का पीछा करने के लिए प्रोत्साहित करती है.

कंगना “फेयर एंड लवली” उद्योग का तिरस्कार करती है, जो इस मिथक को बढ़ावा देती  है कि गोरापन ही सुंदरता है.

नीना गुप्ता

बॉलीवुड अभिनेत्री नीना गुप्त ने ‘बधाई हो’ फिल्म में एक अधेड़ महिला, जो गर्भवती हो जाती, की भूमिका निभाई. यह समाज की पित्तृसत्ता के मुँह पर तमाचा है जो महिलाओं को रसोई की रानी बना कर रखना चाहते है. अभी कुछ ही दिन पहले, नीना ने ‘वर्वइंडिया’ के लिए एक बोल्ड शूट किया, जिसकी तस्वीरें उन्होंने इंस्टाग्राम पर डाली और लोगों ने काफी पसंद की.

नीना, जो 59 साल की है, पित्तृसत्तात्मक समाज को अपने खूबसूरत अंदाज़ में चुनौती दे रही है और हर उस महिला को प्रोत्साहित कर रही है जो खुद की उम्र से सुंदरता नापती है.

सुष्मिता सेन

सुष्मिता वास्तविक में नारीवादी अभिनेत्री हैं. सुष्मिता ने करियर की उच्चाई पर एक साहसिक कदम उठाया और एक अनाथ लड़की को गोद लिया, जब वह केवल 25 वर्ष की थी. यह भी बिना किसी पुरुष से शादी किए. सुष्मिता का यह कदम पितृसत्तात्मक भारतीय मानसिकता के लिए एक झटका था. यही कारण है कि इसे अदालत में चुनौती दी गई थी कि कैसे एक अकेली महिला एक बच्चे को गोद ले सकती है. सुष्मिता की जीत नारीवाद का अच्छा उदाहरण था.

2010 में उन्होंने एक और लड़की को गोद लिया, जिसका नाम अलीसा रखा. इस कदम को भी पितृसत्तात्मक मानसिकता के लोगों ने चुनौती दी थी. लेकिन, जीत सुष्मिता की हुई.

ऋचा चड्ढा

ऋचा के दिलचस्प किरदार, उन्हें झुंड से अलग करते हैं, लेकिन इससे भी अधिक, विभिन्न मुद्दों पर उनके निडर विचार – जैसे कि बॉडी-शेमिंग और हाल ही में, मानव तस्करी – उनकी ईमानदारी, समर्पण और अद्वितीयता दिखाता है. ऋचा के अनुसार, हम एक पितृसत्तात्मक समाज में रह रहे हैं, और सिनेमा में महिलाओं का चित्रण यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है. महिलाओं को वस्तुकरण और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. फिर भी, खुद को मजबूत रखें और रुके नहीं.

कल्कि कोचलिन

कल्कि के नारीवाद का व्याख्यान करना आसान नहीं. किरदारों से लेकर, सोशल मीडिया पर और फिर कमर्शियल फिल्मों को छोड़ महिला-केंद्रित फिल्में चुनना, कल्कि ने कोई कसर नहीं छोड़ी पितृसत्ता के खिलाफ लड़ाई में. मार्गरिटा विद स्ट्रॉ, दैट गर्ल इन यलो बूट्स या वेटिंग जैसी फिल्मों में अपनी अपरंपरागत भूमिकाओं के लिए, उन्हें कभी भी भारी कीमत नहीं चुकानी पड़ी. शैली चोपड़ा और मेघना पंत की पुस्तक – फेमिनिस्ट रानी में प्रकाशित एक साक्षात्कार में, कल्कि ने बताया कि शादी की सबसे बड़ी समस्या है, एक महिला के लिए, “स्वामित्व” का विचार.

कल्कि ने चाहे कविता के ज़रिय, किरदारों के ज़रिए या बात चीत में, हमेशा पितृसत्ता और समाज को हक्का बक्का करने वाला जवाब दिया है.

(pic by Lallantop, Indian Express)

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