हमारे जैसे देश में एक कामकाजी महिला होना एक उपलब्धि है और यदि आप एक माँ हैं और साथ साथ काम भी करती हैं तो वह एक दोगुनी उपलब्धि है.

एक नारीवादी प्रकाशन कंपनी की फाउंडर मंदिरा सेन ने कामकाजी महिलाएं और मातृत्व के विषय में कहा,”अगर एक महिला मध्यम वर्ग से जुड़ी है, तो उसे शायद थोड़ा अधिक विकल्प और समर्थन मिले, लेकिन साधारण कार्यकर्ता महिला ने हमेशा काम ही किया है। ”

उन्होंने कहा, “वह काम करती थी क्योंकि उन्हें करना पड़ता था, और जब उसे करना पड़ता था, तब वह किसी और के साथ बच्चे को छोड़ देती है. तो बहुत दुख महसूस होता है महिलाओं को जो मज़दूर वर्ग की होती हैं। और ये ऐसी महिलाएं हैं जो समाज से कोई समर्थन नहीं प्राप्त करती हैं, जिसमें उनके परिवार भी शामिल हैं। ”

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समर्थन प्रणाली की कमी एक मुख्य कारण यह है जिसके कारण आज की महिलाएं घर से काम करना पसंद करती हैं.

लेखिका किरण मंराल के साथ हमारे पहले इंटरव्यू में कहा, “काम कर रही माँ के लिए भारत में चाइल्डकैयर एक बहुत बड़ी मुश्किल है. छोटे बच्चों के लिए पर्याप्त संगठित और विश्वसनीय डेकेयर नहीं हैं, कार्यस्थल और घर के बीच अक्सर बहुत दूरी होती हैं. जब तक बच्चे के लिए घर में कोई परिवार का सदस्य (एक सास या मां), यह एक छोटे बच्चे और काम के साथ संतुलन बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती हैं.

लेकिन महिलाओं के आंदोलन और नारीवाद के प्रचार के कारण अब इस विषय में खुले में बात होने लगी हैं.

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मंदिरा, जो भटकल और सेन की फाउंडर हैं और अब एक दशक से अधिक समय से महिलाओं के लेखों के काम प्रकाशित कर रही हैं का तर्क है कि यदि नारीवाद सफल हुआ है और समाज में बदलाव लाया है, यह केवल मध्यवर्ग की महिलाओं के लाभ के लिए हुआ है ।

अब हमारे पास एक सांस्कृतिक कॉर्पोरेट परिवर्तन तो है, लेकिन जब तक सामाजिक परिवर्तन नहीं आता है, तब तक माताओं को दोषिता की भावना का सामना करना पड़ेगा, भले ही वे हर दिन काम पर जाये.

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