हम में से ज्यादातर लड़कियां इसी दुविधा में रहतीं हैं कि लीजिये अब उनके पीरियड्स आने वाले हैं या पीरियड्स चल रहे हैँ। बहुत लोग तो अभी भी “पीरियड्स” शब्द का इस्तमाल करने से कतराते हैं। कारण बिलकुल साफ़ है, वह यह है कि यह चर्चा आम या सामान्य नहीं है। हमारे सामने कुछ ऐसे सच हैं जिन्हे न तो हमने खुले दिल से स्वीकार किया है, और न लोगों ने।

ऐसा नहीं है कि चर्चा हो नहीं रही है या लोग पीरियड्स के बारे में जानते नहीं हैं। बस फर्क इतना है कि चर्चा का स्तर सीमित है। इसमें आप बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज को गिनती में ले सकतें हैं। सामान्य लोगों की दिन-प्रतिदिन की चर्चा में अभी भी पीरियड्स को एक समान स्थान नहीं मिला है। हालांकि समानता के कदम जरूर उठाये जा रहें हैँ। फ़िल्मी जगत की बात करें तो ‘पैडमैन” जैसी फ़िल्में और “पीरियड: एन्ड ऑफ़ द सेंटेंस” जैसी डाक्यूमेंट्री आदि अपने प्रयासों में लगी हुई हैं।

इस समय का समाज दो तबकों में बटा हुआ है। एक वह है जो काफी खुले विचारों का है लेकिन एक दूसरा भी है। निराशा की बात यह है कि खुली विचारधारा वाले लोग कम संख्या में हैं। वरना आप खुद से यह प्रश्न कीजिये कि क्यों हर बार आपको पैड, किसी दुकानदार द्वारा नीचे से काली थैली में सरका कर दिया जाता है। क्यों आपको आपके पीरियड्स के समय मंदिर ले जाने पर संकोच जताया जाता है। इन सभी क्यों के जवाब हमारे भीतर ही हैं लेकिन स्वीकार करने में हमे देरी हो रही है।

अगर हाल में हुए विवादित सबरीमाला के मुद्दे को देखें तो वह क्या दर्शाता है? यही सारी बातें लोगों की सोच का प्रतीक होती हैं। पीरियड्स को समान तरह से लेना तो दूर की बात है, लोगों को तो इसमें गलत चीज़ें भी दिखाई देने लगतीं हैं।

लेकिन पहला और आखिरी प्रश्न यह है कि यह मुद्दा अभी भी एक शर्म का मुद्दा क्यों है। यह चर्चा होना बेहद जरुरी है और जाहिर है कि इसकी शुरुआत साथ-साथ बैठकर विचारविमाश से ही हो पाएगी। मेरा सुझाव लोगों के लिए यह है कि अब वे इक्कीसवी सदी के दौर में रह रहे हैं। उपयुक्त होगा कि वे स्वयं को, दूसरे लोगों और उनकी समस्याओं को आसानी से लें, अगर वो पीरियड्स को समस्या मानते हों, तो। साथ ही मूल्यांकन में थोड़ा कम विश्वास करें और चर्चा में ज्यादा।

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