ग्लोबलाइजेशन और इंडस्ट्रियललाइजेशन से कई नए क्षेत्र बने हैं जहां रोजगार मिलने की संभावना बढ़ गई है. जागरूकता और शिक्षा प्राप्त के कारण महिलाएं हर जगह बढ़-चढ़कर सारे क्षेत्रों में हिस्सा ले रही हैं और अपनी पहचान बना रही है.

एक कामकाजी महिला की बेटी होने के कारण मैंने अपनी मां को कई चुनौतियों का अकेले सामना करते हुए देखा है और हमेशा यही सोचा है कि उनकी जैसी कितनी महिलाएं आज भी ऐसी कठिनाइयों का शिकार है. जिंदगी भर की कठिनाइयों में से कुछ कठिनाइयां ऐसी भी होती है जो दिखाई नहीं देती, जैसे:-

1. सामाजिक दबाव

आज भी समाज के कई हिस्सों में यह माना जाता है कि महिलाओं का काम सिर्फ घर पर बैठना और रसोई संभालना है .अगर इससे आगे कोई सोचता है तो वह शिक्षक जैसी नौकरी के बारे में ही सुझाव देता है जहां एक महिला अपने काम के साथ घर पर भी बराबर का ध्यान दे सकें. क्रिमिनल लॉयर, मैकेनिकल इंजीनियर, जैसी नौकरियों को महिलाओं के लिए आज भी सही नहीं समझा जाता. यह सब सामाजिक अपेक्षाएं यह दर्शाती है कि अंत में महिला की प्राथमिकता घर संभालना ही होनी चाहिए.

2. महिला से अपेक्षाएं

एक औरत किसी की बेटी, पत्नी, बहु और मां होती है और हर रिश्ते की अपने अपेक्षाएं होती है. आज भी एक महिला से बच्चे को उठाना, तैयार कराना, सुलाना, परिवार का खाना बनाना, सबकी देखभाल करना, और सब को खुश रखने की जिम्मेदारियां उठाने की अपेक्षा की जाती है. इन सब में शायद ही कभी कोई उस महिला से पूछता है कि वह क्या चाहती है. उनकी आशाएं, खुद से अपेक्षाओं के बारे में कभी कोई सोचने का मौका ही नहीं देता तो वह भी भला कहां से अपने कौशल को ढूंढें और व्यक्तिगत तौर पर अपनी पहचान बनाएं ? इन सबके बावजूद भी अगर कोई महिला अपने पैरों पर खड़े होने में कामयाब हो जाती है तो घर परिवार की तरफ से छोटी-छोटी बातों से उनके चुनाव का तिरस्कार किया जाता है या उन्हें कसूरवार महसूस कराने की कोशिश की जाती है.

3. पैसे का विभाजन

जब एक महिला अपनी काबिलियत पर कमाकर पैसे घर लाती है तो बड़ा सवाल यह उठता है कि वह पैसे कहां जाएंगे ? तब कई बार ससुराल वाले बहूँ से यह अपेक्षा करते हैं कि वह अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अपने माता पिता को ना देकर उन्हें दे क्योंकि अब वह उनके साथ रहती है. मैंने अपनी जिंदगी में कई ऐसे भी किस्से देखे हैं जहां पर बहू को अपनी कमाई में से ही जेब खर्च मिलता है और बाकी पैसे ससुराल वाले अपने पास ही रखते हैं.

4. नौकरी की प्राथमिकता

नौकरी में बड़े पद पर पहुंचने के लिए ट्रांसफर होते हैं. जब यह सांस किसी पुरुष के लिए होता है तो उनके शुभचिंतक बहुत प्रसन्न होते हैं, परंतु अगर यही ट्रांसफर किसी महिला के लिए हो तो बच्चे कौन संभालेगा, ना होता है, पति की जरूरत कौन देखेगा, खड़े हो जाते हैं. कई बार हालात ऐसे भी होते हैं कि एक महिला को अपनी नौकरी तक छोड़नी पड़ती है ताकि वह अपने पति की ट्रांसफर के कारण दूसरी जगह जाकर घर बसा पाए.

5. सेहत

भले ही परिवार में पति-पत्नी दोनों कमाते है, पर आज भी आंकड़ों को देखा जाए तो घर परिवार की ज्यादातर जिम्मेदारियां महिला को ही उठानी होती है. घर और बाहर को संतुलित रखने की कोशिश में वह जरूरत से ज्यादा काम कर लेती है और अपने अपनी सेहत के बारे में सोचना तक भूल जाती है. लंबे समय तक ऐसा करने से उनकी सेहत गिर जाती है और डिप्रेशन, जोड़ों में दर्द, जैसी कई शारीरिक व मानसिक बीमारियों का शिकार बन जाती है. फिर भी उनकी अस्वस्थता का कारण उनकी नौकरी ही समझी जाती है.

मैं उन महिलाओं का सलाम करती हूं जो इन सब चुनौतियों के बावजूद भी टूटी नहीं है. साथ उन परिवारों का भी सम्मान करती हूं जो अपनी बेटी, पत्नी, बहु, या मां को अपनी तरफ से पूरा सहयोग देते हैं. उनका सहारा बनकर ऐसी चुनौतियों को जवाब देने की कोशिश करते हैं.

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