आप इसे एक रिवाज़ कह सकते हैं या आप इसे रिवाज़ की आड़ में खुद को जिम्मेदारी से मुक्त कराने का तरीका कह सकते हैं, लेकिन अधिकांश माता-पिता अपनी इच्छा से अपनी विवाहित बेटियों को आधुनिक और रूढ़िवादी दोनों ही तरीके के भारतीय घरों में आज भी छोड़ देते हैं। एक बार जब वह अपने माता-पिता के घर को पीछे छोड़ देती है, तो वे मानते हैं कि उनकी बेटी अब अपने वैवाहिक घर से ताल्लुक रखती है और अब वह उनकी जिम्मेदारी नहीं है। पितृसत्ता ने माता-पिता को यह विश्वास दिलाने में मदद की है कि उनकी बेटियाँ पराया धन हैं। भारत की कई बेटियां इस अलगाव की कीमत चुकाती हैं, जब वे बुरी शादियों में फंस जाती हैं और मदद के लिए कोई उनके पास नहीं होता, उनके अपने माता-पिता भी नहीं।

कुछ महत्वपूर्ण बाते

  • ज्यादातर भारतीय माता-पिता अपनी बेटियों को एक बोझ समझते हैं जिससे उन्हें उनकी शादी करवाकर छुटकारा पाना होता है।
  • बुरी शादियों में फंसी बेटियों के पास कोई रास्ता नहीं होता है और उनके अपने माता-पिता उन्हें एक खराब शादी में “समझौता” करने के लिए कहते हैं।
  • माता-पिता के लिए घर पर विवाहित बेटी होने के रहने की सामाजिक शर्म उनके अपने बच्चे को शारीरिक और भावनात्मक रूप से टूटते हुए देखने की तुलना में अधिक दर्दनाक है।
  • अगर भारतीय माता-पिता अपनी बेटियों से सच्चा प्यार करते हैं, तो उन्हें शादी के बाद भी उनके साथ खड़े रहने का वादा करना चाहिए।

गुरुग्राम के एक पत्रकार को  अपनी पत्नी पर चाकू से कई बार वार करने और फिर उसके चेहरे पर लोहे की रॉड से वार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। द टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए मृतक महिला के पिता ने स्वीकार किया कि उनकी बेटी शादी के शुरुआती दिनों से ही परेशान थी। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि कुछ महीने पहले, महिला का ईयरड्रम उसके पति के मारने के बाद टूट गया था। बार-बार उसके ससुराल वाले और पति उसे प्रताड़ित करते थे और वह इसके बारे में जानते थे । उसने अपने पिता को अपनी मृत्यु के दिन अपने घर आने के लिए भी कहा था। दूसरी ओर, उसके पिता ने इसे एक रोज़मर्रा के पारिवारिक विवाद की तरह अनदेखा कर दिया था और फिर उसी दिन कुछ घंटों बाद महिला की मृत्यु की खबर आई थी।

इन सब बातो से पता चलता है की हम कितने कायर है, इस जूठी दुनिया में जीते -जीते हम कितने आदि हो चुके है अपनी इस जूठी शान और रुतबे के की हम अपनी उस नन्ही सी कली जिसे हमने जन्म दिया, उसे नाज़ो से पाल पोसकर बड़ा किया और फिर एक दिन उसे फेंक दिया नरक में जीने के लिए इस रूढ़िवादी सोच के साथ ये कहकर की अब यही उसकी किस्मत है , हम इस समाज के घटिया लोगो की बातो को नहीं सेहन कर सकते पर हम अपनी उस नाज़ुक परी की लाश देख सकते है।इसमें उसका क्या कसूर?, क्यों समाज की पुरानी तकियानुसी परंपरा की सजा वो सहे, उसका क्या कसूर? , कैसे उन माँ- बाप के लिए आसान हो जाता है अपनी बेटी को मौत के मुँह में धकेलना?, कैसे हम अपनी प्यारी परी के शरीर पे वो ज़ख्म बर्दाश्त कर लेते है? काश की भारतीय माता -पिता के पास इन सवालों का जवाब होता और वो अपनी बेटियों को बचा पाते इस दलदल में जाने से ।

पितृसत्ता के कारण माता-पिता ने हमेशा अपनी बेटियों को बोझ के रूप में देखा है।

हम अपनी बेटियों को सीखाते है की तुम्हे कल दूसरे घर जाना है, तुम्हे अपने आपको बदलना पड़ेगा, तुम्हे समझौता करना पड़ेगा, तुम्हे ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी कोई लड़को को क्यों नहीं सिखाता समझौते का मतलब, एक लड़की अपना सब कुछ छोड़कर नए सपनो के साथ नए घर में आशाओं और उम्मीदों के साथ आती है और धीरे -धीरे सब को कुचल दिया जाता है , उसके अपने भी उसका साथ छोड़ देते है । इस देश में औरत को देवी कहा जाता है और जिस देश की देवी ही खुश न  हो वो देश कभी तरक्की नहीं कर सकता।

यह जानने के बावजूद कि आपकी बेटी के ससुराल वाले और उसका पति नियमित रूप से उसे गालियां दे रहे हैं, माता-पिता क्यों नहीं कुछ कहते? क्या उन्हें अब उसकी परवाह नहीं है? या यह संभव है कि वे अपने बच्चे की शादी की असफलता को एक सामाजिक अपमान के रूप में देखते हैं? बल्कि, लड़की को अपने वैवाहिक घर में एक दर्दनाक मौत मरने दें सकते है, ना की  उनकी वापसी पर सामाजिक शर्म को सहन करने की क्षमता रखना। समाज क्या कहेगा? एक और पहलू यह भी है की शादियों पर ज़्यादा खर्च करना और फिर पूरे समारोह को एक सामाजिक तमाशा बनान  है। शादी को सफल बनाने का दबाव सिर्फ हमारे देश में एक जोड़े के ऊपर ही नहीं होता है। यह उनके परिवारों पर भी होता है।

लड़की को उसके वैवाहिक घर में एक दर्दनाक मौत मरने दो, यह सेहन करना आसान है, नाकि उसके घर में वापस आकर रहकर सामाजिक शर्म को सहन करें।

एक शादी को सफल बनाने के लिए चिंता से मुक्त होने के लिए, माता-पिता भी अपनी विवाहित बेटियों के लिए सभी सहायता करना बंद कर देते है। बुरी शादियों में कई महिलाओं का कोई सहारा नहीं होता है। वह किसीके पास नहीं जा सकती, क्योंकि उनके माता-पिता उनके लिए खड़े होने की तुलना में “समझौता” या “सहना” या “कठिन प्रयास” करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। क्या यह उन्हें किसी स्तर पर जवाबदेह नहीं बनाता, अगर ऐसी महिलाओं के साथ कुछ होता है? अगर उनकी हत्या हो जाती है, उन्हें जला दिया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है, मानसिक शरण में फेंक दिया जाता है, बलात्कार किया जाता है या सड़क पर छोड़ दिया जाता है, तो असमर्थ माता-पिता को नहीं, खुद को भी दोष देना चाहिए?

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