दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि उनकी सरकार ने महिलाओं के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुक्त करने  का प्रस्ताव दिया है। इसका मतलब है कि डीटीसी, क्लस्टर बसों और दिल्ली मेट्रो में सवारी के लिए महिलाओं को किसी भी पैसे का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। इस कदम को एक सुरक्षा उपाय के रूप में लागू किया जा रहा है। लेकिन क्या यह कदम  गरीब परिवारों के पुरुषों के लिए उचित है ? क्या केजरीवाल सरकार यह मान रही है कि ज्यादातर महिलाएँ आर्थिक रूप से निर्भर हैं और बस टिकट खरीदने का खर्च भी नहीं उठा सकती हैं? निश्चित रूप से ऐसा नहीं है, फिर जो लोग इस योजना का लाभ उठाने में सक्षम हो सकते हैं, वे क्यों करें? पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा उन सभी छात्रों और  लोगो  के लिए मुफ्त में उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो रोज़ के आने – जाने का खर्चा नहीं उठा सकते , ना की किसी के लिंग के आधार पर ।

सिक्के के दो पेह्लूं

क्या पुरुषो के साथ जुर्म की घटनाएँ नहीं होती हैं और तो और इस फैसले से पुरुषों में आक्रोश की भावना आ सकती है ?

पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा उन सभी छात्रों और लोगो  के लिए मुफ्त में उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो रोज़मर्रा का अपनी यात्रा का खर्चा उठा नहीं सकते , पब्लिक ट्रांसपोर्ट लिंग के आधार पर नहीं  बल्कि आमदनी के आधार  पर मुफ्त होना चाहिए ?

मुद्दा महिलाओं की सुरक्षा का नहीं सबकी सुरक्षा का है

इस तरह , महिलाओं को पब्लिक ट्रांसपोर्ट से पूरी तरह से भुगतान करने से छूट देने के बजाय, इसे छात्रों और सभी लिंग के लोगों के लिए जो कम आय वाली पृष्ठभूमि से आते है उन सब के लिए मुफ्त बनाया जाना चाहिए। एक व्यक्ति यह तर्क दे सकता है कि अगर हम यहां समानता की वकालत कर रहे हैं, तो महिलाओं को बस या ट्रेन में आरक्षित सीटों की आवश्यकता क्यों है? यह पूरी तरह से एक अलग मुद्दा है। बहुत सारे और मुद्दों की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट, भारत में एक पुरुष-प्रधान जगह बनी हुई है। इस प्रकार यह महिलाओं द्वारा गलत माना जाता है, इसलिए,  उनके लिए एक सीट आरक्षित करने का मतलब है कि उनके लिए एक ऐसी दुनिया में जगह बनाना जहां वे बिन बुलाए महसूस करते हैं।

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