23 साल की उम्र में शिबानी भास्कर संयुक्त राज्य अमेरिका की महिला राष्ट्रीय टीम की कप्तान हैं. उन्होंने अप्रैल में ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान टीम का नेतृत्व किया. भास्कर ने 11 साल की उम्र में प्रतिस्पर्धी क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था.  11 वर्ष की उम्र में पश्चिम बंगाल अंडर -16 लड़कियों की टीम का प्रतिनिधित्व किया.. बाद में वह 2007 में अपने परिवार के साथ मुंबई चली गईं और माटुंगा जिमखाना, शिवाजी पार्क और गली क्रिकेट खार जिमखाना में खेलना शुरु किया.  जब वह 2008 में चेन्नई शिफ्ट हुई तो उन्हें तमिलनाडु अंडर -19 लड़कियों और वरिष्ठ महिला टीमों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया.

16 साल की उम्र तक  उन्हें भारत में दक्षिण जोन सीनियर विमेन टीम में चुन लिया गया. 2011 में, उन्होंने इंटर-जोनल चैंपियनशिप जीती. जब वह वहां पढ़ रही थी तो उन्होंने चार साल तक एमओपी वैष्णव और मद्रास विश्वविद्यालय का नेतृत्व किया. उन्होंने 17 साल की उम्र में अपनी अंतरराष्ट्रीय शुरुआत की, जब उन्हें आईसीसी महिला विश्व कप क्वालीफायर में 2011 में संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय महिला क्रिकेट टीम के लिए खेलने के लिए चुना गया था.

भास्कर ने गोल्फ के साथ एथलेटिक्स, तैराकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल में भी हाथ अज़माया लेकिन क्रिकेट ही उनकी पसंद थी. शिकागो में पैदा हुए, शिबानी भास्कर चेन्नई से ताअल्लुक़ रखती है.

“मेरा परिवार मेरी प्रेरणा है. मेरे पिता और मैं क्रिकेट को एक साथ देखते थे और गेम का विश्लेषण करते थे, भले ही वह एक आईपीएल गेम, अंतरराष्ट्रीय खेल, महिला खेल या क्लब गेम हो. “- भास्कर

सामाजिक बेड़ियाँ तोड़ना

चेन्नई में मेरे स्कूल और कॉलेज के लोग खेल को लेकर सहायक थे. मुझे अनुमति थी कि शिविर के दौरान मैं स्कूल और कॉलेज देर से आ सकती थी या फिर जल्दी जा सकती थी. हालांकि एक छात्रा के तौर पर  मुझे अपना ग्रेड बनायें रखना था और अपना असाइनमेंट जमा करना पड़ता था, लेकिन दोनों संस्थानों ने खेल को प्रोत्साहित किया. मेरी अध्यापिका मुझे स्कूल के बाद, लंच ब्रेक के दौरान और अपने खाली समय में पढ़ातें थे. आपका स्कूल और कॉलेज आपको एक खिलाड़ी के रूप में बना सकता है या ख़त्म कर सकता है. मेरे स्कूल और कॉलेज ने निश्चित रूप से मेरी मदद की.

“लोग सवाल पूछते है ‘महिलाये क्रिकेट खेलती हैं?’ लेकिन मेरे परिवार और रिश्तेदार काफी मददगार थे और वह मेरा उत्साही बढ़ाते थे और सराहना करते थे.”

लड़कियों के लिए अकादमी

2017 महिला विश्व कप में भारत के अभियान के बाद महिला क्रिकेट ने बहुत अधिक लोकप्रियता हासिल की है. अब लोग जानते हैं कि महिलाएं क्रिकेट खेलती हैं, और माता-पिता अपनी लड़कियों को क्रिकेट लेने की इजाजत दे रहे हैं. अब क्रिकेट अकादमी लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा ले रही है.

चुनौतियां

सरकार द्वारा टीमों की सहायता करने के बारे में बताते हुये, भास्कर कहती है, “बड़े वार्षिक वित्तीय व्यय की तुलना में, सरकार ने भारत में खेलों को बढ़ावे के लिये कुछ ज्यादा नही किया.”

व्यक्तिगत कोचों ने भारत के लिए और अधिक पदक जीते हैं

उन्होंने कहा,”सरकार के खेल मंत्रालय के पास ढेर सारे एसएआई संस्थान और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स और कोच और प्रोग्राम दशकों तक रही जिसपर भारी खर्च किया जाता रहा. लेकिन परिणाम बेहतर नही रहें. अभिनव बिंद्रा से लेकर लीएंडर पेस से साक्षी मलिक, पीवी सिंधु और साइना नेहवाल, इन सब को देखा जायें तो पता चलता है कि  व्यक्तिगत कोचों ने भारत के लिये अधिक पदक जीते है सरकारी वेतन पाने वाले स्पोटर्स खिलाड़ियों से.

तो आगे रास्ता क्या है?

भास्कर सोचती हैं, “सरकार को सरकारी कार्यक्रमों पर पैसा बर्बाद करने के बजाय और अधिक चैंपियन बनाने के लिए व्यक्तिगत कोचों को पैसा दिया जाना चाहिये. गोपी सर ने पहले ही 10 साल में दो ओलंपिक पदक जीते हैं, जो एसएआई(साई) ने 60 साल में नही किया.  विश्व में खेलों में आगे रहने वाले कई देश में खेल मंत्रालय तक नहीं है. ”

उन्होंने आगे कहा, “खेल विकास के लिए नियामक तंत्र स्थापित करने में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है. उन्हें पुरुषों और महिलाओं के लिये समान आधारभूत संरचना, बराबर मीडिया कवरेज और समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए. ”

कवरेज की कमी कैसे मुश्किल पैदा करती है

“प्रसारण की कमी महिलाओं के खेल को नुकसान पहुंचाती है – खेलों में महिलाओं के विकास में बाधा डालने वाला नंबर एक कारण मीडिया की मदद नही मिलना है.”

भास्कर ने कहा, “रूस में विश्व कप फुटबॉल, पिछले साल महिलाओं के विश्व कप मैचों का इंग्लैंड में प्रमुख तौर पर टेलीविजन कवरेज दिया गया था और दुनिया भर में प्रसारित किया गया था. यही कारण है कि लोग मिताली राज और हरमनप्रीत कौर के बारे में जानते हैं. जबकि शांति रंगस्वामी, फौजीह खलीली, सुधा शाह और अन्य लोगों द्वारा खेल में किये गये प्रदर्शन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है. मीडिया ने पहले ही दावा किया है कि सार्वजनिक तौर पर महिलाओं के खेल देखने में भारतीय दर्शकों की कोई दिलचस्पी नहीं है.”

“मीडिया ने पहले ही दावा किया है कि सार्वजनिक तौर पर महिलाओं के खेल देखने में भारतीय दर्शकों की कोई दिलचस्पी नहीं है.”

वो कहती है,”अंतरराष्ट्रीय स्तर पर,  कई पुरुषों के टेनिस मैचों से ज्यादा उत्सुकता दर्शकों में सेरेना विलियम्स या अन्ना सर्गेईवना जैसी खिलाड़ियों के लिये है. क्रिस एवर्ट ने उतने ही दर्शकों को आकर्षित किया है जितना जिमी कॉनर्स किया करते थे. पीवी सिंधु और साइना नेहवाल निश्चित रूप से हमारे पुरुष शटलर की तुलना में अपने बैडमिंटन खेल के ज़रिये अधिक दर्शक आकर्षित करती हैं. इस तरह के उदाहरण कई खेलों में मिल जायेंगे. फिर भी,  हमारे मायोपिक मीडिया विशेषज्ञ कुछ स्थानीय और महत्वहीन पुरुषों के क्रिकेट मैचों को प्रसारित करते है लेकिन भारतीय राष्ट्रीय महिला टीम के अंतर्राष्ट्रीय मैचों को महत्व नहीं देते है.”

खेल में लिंग भेदभाव

उन्होंने कहा,”कुछ खेलों में, जहां लिंग भेदभाव होता है, पूर्वाग्रह बहुत बड़ा होता है. क्रिकेट एक ऐसा ही खेल है जो इस श्रेणी में आता है. 10 से अधिक वर्षों से पुरुषों का आईपीएल चल रहा है. ऑस्ट्रेलिया में पुरुषों और महिलाओं के लिए बिग बैश है, इंग्लैंड में पुरुषों और महिलाओं के लिए सुपर लीग है. ”

“इसके अलावा, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया पुरुषों और महिलाओं के क्रिकेटरों के लिए अनुबंधों में वेतन अंतर को कम करने के काफी करीब है, जबकि भारत में पुरुषों और महिलाओं के क्रिकेटरों के बीच वेतन अंतर हिमालय के बराबर है.”

भारत में लड़कियों के लिए अवसर

भास्कर कहती हैं, लड़कियों को खेल में आने की संभावनायें कम है. वह दावा करती है, “पूर्व जर्मनी में, सरकार ने लड़कियों के बीच खेलों को बढ़ावा देने को महत्वपूर्ण माना है.  उन्होंने महसूस किया कि एक स्वस्थ लड़की स्वस्थ मां बन जाएगी और उसकी संतान भ्रूण से ही स्वस्थ रहेंगी. इसके अलावा, उनका मानना है कि एक सक्रिय खेल संस्कृति अगली पीढ़ी को भी आगे बढ़ने में मदद करेंगी. यूएस ने टाइटल IX नामक अपना संस्करण लाया और अनिवार्य किया कि लड़कों और लड़कियों के पास खेल के लिए समान अवसर होना चाहिए. ”

“भारत में, लड़किया स्कूल पीटी कक्षा के दौरान भी खेल और गेम्स में भाग नहीं लेती हैं. लड़कों के खेल के दौरान उन्हें किनारे बैठने और बात करने की अनुमति होती है. दूसरी बात यह है कि शिक्षकों और माता-पिता के दृष्टिकोण को बदलना जो अक्सर स्कूलों में पीटी कक्षाओं को रद्द करते हैं ताकि बच्चे गणित या विज्ञान कार्य पूरा किया जा सकें.

यह सवाल नहीं है कि क्या भारत अधिक ओलंपिक पदक जीतेंगे. पूरा देश उसी सोच में लगा हुआ है. जरुरत इस बात की है कि देश की एक बड़ी आबादी में न्यूनतम एथलेटिक क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिये और यह तभी मुमकिन है जब हम लड़कियों पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

महिला क्रिकेट का भविष्य

“क्रिकेट खेलने वाली लड़कियों का भविष्य अच्छा नज़र आ रहा है. न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में लड़कियों के क्रिकेट के लिए अवसर बढ़ रहे हैं. इसलिए  इस समय खेल में आने वाले युवा, वर्तमान और पूर्व क्रिकेटरों द्वारा बनाई गई ज़मीन का लाभ ले सकते है.”

Email us at connect@shethepeople.tv