जब महिलाओं के लिये उत्पादों की मार्केटिंग की बात आती है तो संस्थाओं के पास कोई एक सेट फार्मूला नहीं होता है. सौंदर्य प्रसाधन जैसे उत्पादों के लिए भी, जो ज्यादातर महिला केंद्रित होती हैं, उसमें भी कंपनियां त्वचा गोरी करने वाली क्रीम जैसी विचित्र रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देती है. हालांकि, अब बदल आ रहा है. उद्यमियों की नयी पौध महिलाओं को आकर्षित करने के लिये मार्केटिंग और विज्ञापन रणनीतियां को बदल रही है. यह पारंपरिक कंपनियों को भी बदलाव करने के लिये मजबूर कर रही जो लंबे समय तक पुरुषों को अपने ग्राहकों के रूप में देखा करती थी अब उनका लक्ष्य महिलायें भी है.

नील्सन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, निवेश निर्णयों को लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 2013 में 37 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 52 प्रतिशत हो गया. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान काफी बढ़ गया है. बैंकिंग और निवेश उद्योग अब महिलाओं को संभावित ग्राहकों के रूप में देखते हैं और विशेष रूप से उनके लिए वित्तीय उत्पाद भी जारी कर रहे हैं.

रविवार शाम को डिजिटल महिला पुरस्कारों में ‘मार्केटिंग टू महिलाओं’ पर एक पैनल चर्चा में, पैनालिस्ट-अरपीता गणेश, बटरकप की संस्थापक, दा मिलानो की शिवानी मलिक, आईबीएम इंडिया और दक्षिण एशिया के सीएमओ दीपाली नायर ने चर्चा की कि मार्केटिंग किस तरह से महिलाओं के लिये काम करता है.

कुछ ख़ास बातें
• परंपरागत रूप से पुरुषों को टारगेट करने वाली वित्तीय फर्म अब महिलाओं को ग्राहकों के रूप में देख रही हैं और उन्हें पूरा करने के लिए रणनीतिया बना रही है.
• वित्तीय सेवाओं में अब भी महिलाओं को निर्णय नही लेने दिया जाता है.
• कंपनियां अपने उपयोगकर्ताओं के साथ बेहतर संपर्क करने के लिए उपयोगकर्ताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध बना रही है.
• ग्राहकों की प्रतिक्रिया का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है.

नायर ने इस बारे में बताया की कैसे भारतीय महिलाएं विविध हैं और विभिन्न भौगोलिक आधार से संबंधित महिलाओं को वित्तीय उत्पादों के बाजार में विभिन्न रणनीतियां के तहत आकर्षित किया जा रहा है. “भारत में बहुत सी महिलाएं जो अच्छा पैसा कमा रही है वह अपने वित्तीय फैसले अपने पिता, बेटों, भाइयों और पतियों पर काफी हद तक छोड़ देती हैं. और आपको लगता है कि बैंक संदेश ज्यादातर स्पैम हैं, तो मैं 2007 में महिलाओं को बीमा पॉलिसी के बारे में बात करने के लिए पंजाब में था और वहां महिलाएं ने कहा कि उन्हें कोई संदेश नहीं मिल रहा है और वे संदेशों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना पसंद करेंगी. तो भारत विविध है और दिल्ली और मुंबई की महिलाएं टियर टू शहरों की महिलाओं से बिल्कुल अलग होंगी. वित्तीय सेवाओं के मामलें में महिलाओं के निर्णय लेने का हिस्सा अभी भी छोटा सा है.”

“हमारे लिए सभी चीजों में से सबसे मह्तवपूर्ण यह है कि हम ट्रेंड को समझे की महिलाओं की किस चीज़ की तलाश है. पूरे भारत में महिलाओं के साथ हमारी बातचीत में, हमने पाया कि महिलाएं चाहती है कि वो जो कुछ भी करती हैं उसमें अर्थ हो और जो कुछ भी करने की कोशिश कर रही हैं उसमें भी वह अर्थ ढूंढती हैं. ” – शैली चोपड़ा

यहां तक कि अन्य उद्योगों में भी, भारतीय कंपनियां उन उत्पादों में लिंग तटस्थ अभियान चलाने का प्रयास कर रही हैं, जिन्होंने पहले महिलाओं को संभावित खरीदारों के रूप में समझा था. मीडिया में सेक्सिस्ट विज्ञापन जो महिलाओं को वस्तुओं के रूप में देखता था उसमें अब गिरावट आ रही हैं.

अधिक से अधिक महिला उद्यमी स्टार्टअप में शामिल हो रही है तो बदलाव नज़र आ रहा है. इन महिला उद्यमियों का एक बड़ा हिस्सा नए उत्पादों को बनाना शुरू कर दिया है क्योंकि उन्हें लगा कि दिग्गजों कंपनियां में बहुत सी कमी थी. उदाहरण के लिए, बटरकप्स अस्तित्व में आया क्योंकि अर्पिता गणेश ने भारतीय महिलाओं के लिए अंतरंग पहनने के लिए विस्तृत फिटिंग उपायों की आवश्यकता देखी जो मानक श्रेणियों में फिट नहीं होते हैं.

गणेश ने बताया, “महिलाओं के लिए अधोवस्त्र की मार्केटिंग के संदर्भ में हमनें खुद को अलग करने और बदलाव लाने के लिए फैसला किया कि वेबसाइट पर मॉडल न रखें. मार्केटिंग के लिए भी हमारे पास कोई मॉडल भी नहीं हैं. हम वेबसाइट पर किसी भी श्रेणी में सेक्सी शब्द का उपयोग नहीं करते हैं और तीसरा हम कहीं भी हमारी मार्केटिंग में गुलाबी, काले और लाल का उपयोग नहीं करते हैं. जबकि हमारे पास उन रंगों में उत्पाद हैं, लेकिन इसका उपयोग मार्केटिंग में इतना किया जा चुका है कि उसका महत्व ही ख़त्म हो चुका है. हमें रूढ़िवादी सोच को तोड़ना है कि केवल कुछ रंग ही महिलाओं के लिए काम आते हैं.

उन्होंने आगे कहा कि हम नहीं चाहते हैं कि हमारे ग्राहकों को यह महसूस हो कि वे मॉडल की आकृति से मेल नही खाते है और इस तथ्य को बताने के लिये हम हर तरह के फीगर के लिये बनाते है, हमारे लिये सभी महत्वपूर्ण है.

“महिलाओं के लिए अधोवस्त्र की मार्केटिंग के संदर्भ में हमनें खुद को अलग करने और बदलाव लाने के लिए फैसला किया कि वेबसाइट पर मॉडल न रखें. मार्केटिंग के लिए भी हमारे पास कोई मॉडल भी नहीं हैं. हम वेबसाइट पर किसी भी श्रेणी में सेक्सी शब्द का उपयोग नहीं करते हैं और तीसरा हम कहीं भी हमारी मार्केटिंग में गुलाबी, काले और लाल का उपयोग नहीं करते हैं,” – अर्पिता गणेश

हैंडबैग ब्रांड दा मिलानो की शिवानी मलिक अपने ग्राहकों की प्रतिक्रिया की बारीकी से समीक्षा करती है. उन्होंने बताया किया कि आज की महिलाएं पूरी तरह से जानकारी रखती है और उन्हें स्टोर में प्रवेश से पहले ही मालूम होता है कि उन्हें क्या चाहिये. मलिक ने कहा, “यह तकनीक की सुंदरता है क्योंकि वे पहले ही जानती हैं कि क्या चीज़ उपलब्ध है.”

शैली चोपड़ा, SheThePeople.TV की संस्थापक ने बात की किस तरह से महिलायें अपनी बात रख सकती है. उन्होंने कहा, “हमारे लिए सभी चीजों में से सबसे मह्तवपूर्ण यह है कि हम ट्रेंड को समझे की महिलाओं की किस चीज़ की तलाश है. पूरे भारत में महिलाओं के साथ हमारी बातचीत में, हमने पाया कि महिलाएं चाहती है कि वो जो कुछ भी करती हैं उसमें अर्थ हो और जो कुछ भी करने की कोशिश कर रही हैं उसमें भी वह अर्थ ढूंढती हैं. “

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