हाल ही में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नाडिया मुराद ने दुनिया के साथ अपने जीवन और उनके सामने पेश आयी कठिनाइयों को साझा किया. इस वर्ष का पुरस्कार संयुक्त रूप से नादिया और डेनिस मुकवेज को “युद्ध और सशस्त्र संघर्ष के हथियार के रूप में यौन हिंसा के उपयोग को समाप्त करने के उनके शांति प्रयासों के लिए” दिया गया है.

नाडिया को आईएस सेना(इस्लामिक स्टेट इन इराक़) उठा कर ले गई थी और आतंकवादियों ने उनके साथ बलात्कार किया. वह 2015 की शुरुआत में उनके कब्ज़े से जर्मनी भागने में कामयाब रही. लेकिन छिपाने के बजाय, साल के अंत तक, उन्होंने मानव तस्करी के खिलाफ अपना साहसिक अभियान शुरू कर दिया.

नाडिया की तरह, कई महिलाओं ने विभिन्न तरीकों और क्षमताओं के माध्यम से दुनिया में शांति लाने के लिये योगदान दिया है. यहां उन सभी महिला नोबेल शांति पुरस्कार विजेताओं की एक सूची हम दे रहे है:

बैरोनेस बर्था वॉन सुट्टनर, 1905

ऑस्ट्रिया के बैरोनेस बर्था वॉन सुट्टनर नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित होने वाली पहली महिला थीं. अपने जीवन के उत्तरार्ध में, उन्होंने 1890 के अंतर्राष्ट्रीय शांति आंदोलन के लिए अथक रूप से काम किया. उन्होंने ऑस्ट्रेलियन पीस सोसायटी की भी स्थापना की. बैरोनेस कुछ महीनों के लिए अल्फ्रेड नोबेल की सचिव भी थी.

जेन एडम्स, 1931

वह वुमेन इंटरनेशनल लीग फार पीस एंड फ्रीडम की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं. उन्हें सामाजिक कार्यो की मां के रूप में जाना जाता है, पहले विश्व युद्ध में उनकी शांति प्रक्रिया  असाधारण थीं. उन्होंने शिकागो में हुल हाउस की भी स्थापना की.

एमिली ग्रीन बाल्च, 1946

अमेरिकी अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और कार्यकर्ता एमिली ग्रीन बाल्च ने 1946 में पुरस्कार प्राप्त किया. उन्होंने जॉन मोट के साथ पुरस्कार साझा किया. बाल्च ने युद्ध को ख़त्म करने के लिये खुद को समर्पित किया था और प्रथम विश्व युद्ध के बाद शांति आंदोलन का काम किया था.

बेट्टी विलियम्स और मैराड कोर्रिगन, 1976

 

नार्थ आयरलैंड पीस मूवमेंट की स्थापना, मैरीड कोर्रिगन के साथ बेट्टी विलियम्स ने की जिसे बाद में कम्युनिटी आफ पीस पिपुल के नाम से जाना गया. उन्होंने ब्रिटिश, आयरिश और प्रोटेस्टेंट बलों द्वारा हिंसा के खिलाफ शांति प्रदर्शन आयोजित किए जिन्होंने रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट को एक साथ लाया.

मदर टेरेसा, 1979

मदर टेरेसा का काम भारतीयों और दुनिया के प्रति उनकी दयालुता की गवाही है. उन्होंने भारत में मिशनरी ऑफ चैरिटी की स्थापना की और गरीब, रोगग्रस्त लोगों की सेवा करने पर ध्यान केंद्रित किया. उनके शब्दों में, “शांति मुस्कुराहट से शुरू होती है.”

अल्वा मर्डल, 1982

एक स्वीडिश अर्थशास्त्री अल्वा मर्डल, मानवाधिकार की वकालत करती थी और संयुक्त राष्ट्र विभाग की प्रमुख, वह भारत के स्वीडिश राजदूत भी रही. उन्होंने निरस्त्रीकरण के लिये अमेरिका और यूएसएसआर पर दबाव डालने अहम भूमिका निभाई. उन्होंने अल्फोन्सो गार्सिया रोबल्स के साथ पुरस्कार साझा किया.

आंग सान सू की, 1991

आंग सान सु क्यूई म्यांमार के पहले और मौजूदा स्टेट काउंसलर हैं, जिनका स्थान प्रधान मंत्री के बराबर हैं. उन्हें 1991 में देश में उनके आजीवन सक्रियता और संघर्ष के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अपना अधिकांश समय 1989 से 2010 तक हाउस अरेस्ट में बिताया, उसी समय उन्हें यह सम्मान मिला.

रिगोबर्टा मेनचु तुम, 1992

ग्वाटेमाला से रिगोबर्टा मेनचु को 1992 में “स्वदेशी लोगों के अधिकारों के सम्मान के आधार पर जातीय-सांस्कृतिक सुलह” के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वह राष्ट्रीय समन्वय समिति के सदस्य भी बनाई गईं.

जॉडी विलियम्स, 1997

इंटरनेशनल कैंपेन फार लैंडमाइन्स के साथ जॉडी विलियम्स ने 1997 में पुरस्कार जीता. घातक लैंडमाइन्स के खिलाफ उनका सफल अभियान, जो मनुष्यों को लक्षित करता था, सराहनीय था.

शिरिन इबादी, 2003

ईरान में मानवाधिकार केंद्र के रक्षकों की स्थापना का श्रेय शिरिन इबादी को दिया जाता है.  वह शांति पुरस्कार जीतने वाली पहली ईरानी भी है.  शरणार्थी महिलाओं और बच्चों पर उनके काम के लिए उन्हें 2003 में पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

वांगारी मुट्टा माथाई, 2004

अफ्रीका से वांगारी मुटा माथाई को “सतत विकास, लोकतंत्र और शांति में उनके योगदान के लिए पुरस्कार” से सम्मानित किया गया था.  1977 में,  उन्होंने केन्या में ग्रीन बेल्ट मूवमेंट की स्थापना की,  जिसने मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए 10 मिलियन से अधिक पेड़ लगाए.

एलेन जॉनसन सरलीफ, 2011

दो अन्य महिलाओं के साथ, एलेन जॉनसन सरलीफ को महिलाओं की सुरक्षा के लिए उनके अहिंसक संघर्ष और शांति निर्माण कार्य में पूर्ण भागीदारी के अधिकारों के लिए पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.  वह 2005 में लाइबेरिया की प्रेसिडेंट बनी.

लेमा गॉबी, 2011

लेमा गॉबी ने पहले लाइबेरियाई गृहयुद्ध के बाद पूर्व बाल सैनिकों के साथ परामर्शदाता के रूप में काम किया. दूसरे लाइबेरियाई गृहयुद्ध में, उन्होंने शांति लाने के लिये ईसाई और मुस्लिम समुदायों दोनों की महिलाओं को एकजुट किया और गुटों पर दबाव डाला.

तवाकुल करर्मन, 2011

यमन के तवाकुल कर्मन ने स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए देश के भीतर विरोध प्रदर्शन किया. वह वुमेन जनर्लिस्ट विदआउट चैन की भी प्रमुख थीं. लाइबेरिया से दो अन्य महिलाओं के साथ, उन्हें 2011 में पुरस्कार मिला.

मलाला यूसुफज़ई, 2015

उनकी जीवनी ” आई एम मलाला” हर किसी को पढ़ना चाहिए.  इसमें उनकी दर्द भरी यात्रा और  शिक्षा के अधिकार के लिए उनकी लड़ाई का वर्णन है.  2015 में, जब वह केवल 16 वर्ष की थी, मलाला को सबसे कम उम्र में नोबेल शांति पुरस्कार मिला.

इन बहादुर और साहसी महिलाओं की कहानियां हमें सामाजिक न्याय के लिए लड़ने और हमेशा बदलती दुनिया में अपना ख्याल रखने के लिए प्रेरित करती है.

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