आख़िरकार प्यार की जीत हुई! एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अंततः भारतीय दंड संहिता की पुरानी धारा 377 को ख़त्म कर दिया जिसमें समलैंगिकता को अपराध माना गया था. निर्णय लंबे समय से लंबित था और इसके लिये कई लोग लड़ रहे थे. इस मौके पर,  उन पुरुषों और महिलाओं को याद किया जायें और उनकी प्रशंसा कि जायें जिन्होंने LGBTQ  समुदाय के लिए समान अधिकार को हक़ीक़त में बदला.

रितु डालमिया

डालमिया एक सेलिब्रिटी शेफ है और दिल्ली स्थित एक लोकप्रिय इतालवी रेस्तरां की चेन दीवा की मालिक है. 2016 में, वह धारा 377 की कानूनी वैधता को चुनौती देने वाले सह-याचिकाकर्ताओं में से एक थीं. जब वह 23 वर्ष की थी तब से डालमिया इस कानून के ख़िलाफ लड़ रही थी. उनकी लड़ाई उस वक़्त शुरु हुई जब उन्हें दूसरी महिला से प्यार हो गया. यह लड़ाई आसान नही थी. वर्षों से, डालमिया ने भारत में समलैंगिकता के अधिकार, स्वतंत्रता और सामान्यता के बारे में बात की है.

आनंद ग्रोवर

वरिष्ठ वकील लंबे समय से LGBTQ समुदाय के कानूनी अधिकारों के लिए लड़ रहे थे. उन्होंने पहले कहा था, इसे जल्द से जल्द रद्द कर ही दिया जाएगा.

इंदु मल्होत्रा

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ​​पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ में एकमात्र महिला थी, जिन्होंने इस साल जुलाई में धारा 377 की याचिकाएं सुनी थी. उन्हें हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शामिल किया गया था. मल्होत्रा ​​सीधे बार से नियुक्त पहला सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बन गई और LGBTQ समुदाय की एक मजबूत ताक़त बनी. उन्होंने कहा, “न केवल इंसान, बल्कि कई जानवर भी समलैंगिक व्यवहार दिखाते हैं. यह एक विचलन नहीं है बल्कि एक भिन्नता है.”

आयशा कपूर

बिजनेस वुमेन और अभिनेत्री आयशा कपूर उन लोगों में से थी, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 पर दिल्ली उच्च न्यायालय में फैसले को आरक्षित करने के बाद याचिका दायर की थी, जो वयस्कों के समान-यौन संबंधों को अपराध मानता था. न्यूयॉर्क टाइम्स को आयशा ने कहा कि दुनिया काफी कुछ बदल चुकी है, 80 के दशक की दिल्ली से जब ‘लेस्बियन’ का इस्तेमाल एक बुरे शब्द के तौर पर किया जाता था.

मेनका गुरुस्वामी और जेना कोठारी

दो युवा वकीलों ने मजबूत तर्क दिया कि कैसे धारा 377 को ख़त्म करना चाहिये ताकि LGBTQ समुदाय को समानता का अधिकार हो. याचिकाकर्ता नवतेज सिंह जौहर और उनके साथी सुनील मेहरा के उदाहरण देते हुए, जो 24 साल से रिश्ते में हैं, गुरुस्वामी ने पूछा, “ये उदाहरण हमें क्या कहते हैं?”. “कि उनका जीवन उत्पीड़न के डर से बर्बाद हुआ जा रहा है. इन लोगों को अपने जीवन को पूरी तरह से जीने की अनुमति दी जानी चाहिए … उन्हें असुरक्षित, कमजोर जिंदगी जीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.” गुरुस्वामी कोलंबिया लॉ स्कूल में भी पढ़ाती हैं. उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में समुदाय के पक्ष में समर्थन और बहसों में हिस्सा लिया है.

दूसरी तरफ वकील जेना कोठारी का मानना ​​है कि “धारा 377 के तहत अपराधियों को आम तौर पर अपराध का संदेही माना जाता है … मेरी क्लाइंट मर्द के रूप में पैदा हुई थी, लेकिन खुद को औरत समझती है…. वह विवाहित है, लेकिन अगर वह किसी भी यौन गतिविधि में पति के साथ शामिल होती है तो धारा 377 उसके ख़िलाफ लग जायेंगी.”

केशव सूरी

एक और होटेलियर, केशव सूरी ने इस साल धारा 377 को ख़त्म करने के लिये सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सूरी जिन्होंने हाल ही मैं पेरिस में अपने पार्टनर से शादी की ने कहा, “मैं भारत में LGBTQ समुदाय का एक सदस्य हूं और मुझे यह स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है कि मैं एक दशक तक एक वयस्क पुरुष के साथ संबंध में रहा हूं. हालांकि मैं अपनी व्यक्तिगत जिंदगी पर चर्चा नही करना चाहता हूं. लेकिन मुझे लगा कि इस तथ्य को उजागर करना महत्वपूर्ण था. ”

अक्कई पद्माशली

अक्कई बेंगलुरु में रहती है और वह ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोगों में से एक थी जो इस कानून की ख़िलाफ लड़ रहे थे. वह 20 के दशक में एक कार्यकर्ता बन गईं थी. मानद डॉक्टरेट से सम्मानित पद्माशली ट्रांसजेंडर अधिकारों की सुरक्षा के मुद्दों को लगातार उठाती है. इस 32 वर्षीय कार्यक्रता ने भारतीय कानूनी व्यवस्था को हरसंभव चुनौती दी. इस साल की शुरुआत में, पद्माशली ने धारा 377 को चुनौती देने वाली एक याचिका को ट्रांसजेंडर समुदाय की ओर से दायर किया था.

अमन नाथ

67 वर्षीय होटेलियर अपने साथी फ्रांसिस वाकज़ीर्ग के साथ नीमराना होटल के मालिक है. वे दोनों अपने अधिकारों के लिए खुले तौर पर लड़े और धारा 377 के विरोध में एक बड़ी आवाज़ थे. अमन और फ्रांसिस का रिश्ता 23 साल तक 2014 तक चला जब फ्रांसिस की निधन हो गया. उन्होंने एक बेटी को गोद लिया है और उसका नाम आद्या नाथ रखा है.

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