वह सुप्रीम कोर्ट में एक के बाद एक तर्क इस बात के लिये दे रही है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय की सुरक्षा क्यों की जानी चाहियें और यही बात वह पांच सदस्यीय खंडपीठ के सामने भी कर रही है. समाज के द्वारा इस समुदाय के साथ किये जा रहे भेदभाव के ख़िलाफ वह एक वक़ील के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय से धारा 377 पर प्रतिबंध लगाने के लिए आग्रह कर रही है. मिलियें सुप्रीम कोर्ट की वकील मेनका गुरुस्वामी से जो अभी समलैंगिकता के अपराधीकरण के ख़िलाफ लड़ रही है.

मेनका गुरुस्वामी के तर्कों ने भारत की शीर्ष अदालत को धारा 377 के मानवीय मूल्यों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है.

उन्होंने एससी से पहले अपने तर्क शुरू करने से पहले ट्वीट किया, “अपने दिल में संविधान को लिये हम कोर्ट जाते है ताकि एक औपनिवेशिक दाग जो हमारे सामूहिक राष्ट्रीय विवेक पर लगा है उसे हटाया जा सकें. धारा 377 आपका समय आ गया है.”

गुरुस्वामी आईआईटी छात्रों, स्नातकों और पूर्व छात्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो एलजीबीटीक्यू समुदाय से ताअल्लुक़ रखते है और जिन्होंने उस कानून का सामना किया है जो अपनी पसंद के व्यक्ति से प्यार करने से रोकता है. सर्वोच्च न्यायालय में उनका तर्क यह है कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है.

उन्होंने खंडपीठ से पूछा, “हमें दृढ़ता से जानना चाहिए कि हम धारा 377 के तहत असंगत अपराधी हैं? यह प्यार है जिसे संवैधानिक रूप से पहचाना जाना चाहिए, और न सिर्फ यौन कृत्यों के ज़रिये.”

गुरूस्वामी वरिष्ठ वकील की उस टीम में एकमात्र महिला है जो धारा 377 की संवैधानिकता के खिलाफ लड़ रही हैं.  वह न सिर्फ इसके खिलाफ लड़ने वाली पहली महिला बन गई है बल्कि  उन्होंने पांच सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट बैंच में एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा को केस से संबंधित सभी बातें बताई.

समाज के एक वर्ग के खिलाफ हो रहे कानूनी भेदभाव के तरीक़े बताने के अलावा उन्होंने इन लोगों के जीवन में रोजमर्रा पेश आने वाले क्रूर अनुभावों को भी उजागर किया है.

“अपने दिल में संविधान को लिये हम कोर्ट जाते है ताकि एक औपनिवेशिक दाग जो हमारे सामूहिक राष्ट्रीय विवेक पर लगा है उसे हटाया जा सकें. अनुच्छेद 377 आपका समय आ गया है. “

उनकी शिक्षा और काम

गुरुस्वामी ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और उसके बाद न्यूयॉर्क में एक कानूनी फर्म में और फिर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सलाहकार के रूप में काम किया. हाल ही में वह पहली भारतीय महिला बन गई जिनका चित्र ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रोड्स हाउस के मिलनर हॉल में लगाया गया.

उन्होंने अपने भाषण में कहा, “जैसे ही मैं ऑक्सफोर्ड के हॉल और इस हाउस से गुज़री तो देखा कि उनकी दीवारों में मेरे जैसे दिखने वाला कोई नही है और न ही भारत के मेरे साथी रोड्स स्कोलर्स  या अफ्रीकी देशों के अधिकांश स्कोलर्स या फिर दुनिया के बाकी हिस्सों में से मेरे साथी स्कोलर्स.”

रोड्स प्रोजेक्ट के साथ एक इंटरव्यूह में जब उनसे पूछा गया कि वह वकालत करने के लिये भारत क्यों लौट आई तो उन्होंने कहा, “क्योंकि मेरा दिल संवैधानिक कानून में है – भारतीय संवैधानिक कानून. मेरी अधिकांश प्रेक्टिस, वह प्रेक्टिस जिसे मैं सबसे ज्यादा गंभीरता से लेती हूं वह संवैधानिक अधिकार पर है.”

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