विवाह की ‘देय तिथि’ पर बहस एक आम बात है जो रसोई, शादियों, रात्रिभोज की मेज और कॉफी की दुकानों में होती देख सकते है. जब हम इसे अपने भारतीय संदर्भ में रखते हैं तो संबंधित विषय को अधिक महत्व दिया जाता है. हमारी कठोर, लेकिन स्थिर समाज इसे समझने में नाकाम रहा है  – शादी करने के लिए मिलेनियल कपल्स जल्दी में क्यों नहीं हैं? आइए हम स्थिति को समझें और तह तक जाएं.

‘बसने’ का मुद्दा

हमारे देश के सभी युवाओं को समाज या उनके माता-पिता द्वारा किए गए भयभीत प्रश्नों का सामना करना पड़ता है, “कि वे कब सेटल होगें?” सेटल होने का मतलब एक ठीक ठाक डेस्क जाब, एक घर और पत्नि या पति दो बच्चों के साथ. जीवन शैली की प्रकृति खुद ही बदल रही है और ‘आदर्श परिवार’ की धारणा पीछे जा रही है. हम ट्रेवल करना चाहते हैं, हम अपनी तरह से जीना चाहते हैं. व्यक्तिगत जीवन शैली हमारे सिस्टम में आ गई है और हम तदनुसार अपने जीवन की रूपरेखा को फिर से डिजाइन कर रहे हैं.

व्यक्तिगत जीवन शैली हमारे सिस्टम में आ गई है और हम तदनुसार हमारे जीवन के रूपरेखा को फिर से डिजाइन कर रहे हैं. एक बार जब हमें नौकरी मिलती है तो हम प्यार करते हैं और पर्याप्त स्वतंत्र होते हैं, तो विवाह का मुद्दा लाया जा सकता है. इसमें समय लगेगा.

निर्भरता

देश भर में महिला सशक्तिकरण धीरे-धीरे फैल रहा है. पुरुष साथी पर निर्भर होने का तर्क बेतुका लगता है जब महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी करती जा रही हैं. एक रिश्ते में असमान संतुलन, जहां दोनों व्यक्ति अत्यधिक महत्वाकांक्षी हैं, एक संघर्ष में समाप्त होता है. इसलिए, हम समय चाहते हैं. किसी दूसरों से प्यार करने से पहले हमें ख़ुद को प्यार करना सीखना चाहिए, अन्यथा यह एक ग़लत तरीके की निर्भरता की ओर ले जायेंगा.

हमारे समाज के संदर्भ में महिलाएं

पितृसत्ता की गहरी जड़ें हैं और इसे बदलने में समय लगेगा. तब तक हमें अपनी स्थिति को संदर्भित करना होगा. यदि घर के दोनों सदस्य काम कर रहे हैं और थकाऊ दिन से वापस आते हैं, तो घर के प्रबंधन की भूमिका अकेले महिला पर नहीं डाली जा सकती है. यह बहुत स्पष्ट है और दुखद बात यह है कि हमें हर तर्क में यह स्पष्ट करना होता है. हर किसी को जीवन कौशल सीखना होगा और इसलिए हर किसी को घर के कामों को साझा करना होगा. या तो यह पारस्परिक समझ के रूप में काम करता है या नियम बनाना होता है और घर के कामों को विभाजित करने के सारी बातों को फ्रिज पर लटकाना होता है. हमारे समाज में इस क्रांति को आने में समय लगेगा.

25 साल की केमिकल इंजीनियर, चांदनी कहती हैं, “जब कोई लड़की अध्ययन करने के लिए बाहर जाती है, तो वह कई चीजों को महसूस करती है जो उसे उसके अपने घर में नहीं सिखाई जाती थीं. और उम्मीद की जायें कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद गृहिणी की भूमिका निभाने के लिए तैयार है तो यह संभव नहीं है.”

ये सब चीज़े कुछ समय लेती है. आज के परिदृश्य में एक स्थिर दिमाग परिपक्वता के माध्यम से प्राप्त होता है जो उम्र के साथ आता है. जिम्मेदारियों के लिये मजबूर करना सफल शादी का विकल्प नहीं है. विवाह एक छोटा सा कोशिश करने वाले सेशन नहीं है. शादी नहीं करना भी एक विकल्प है, जिसे हमें सम्मान करने की आवश्यकता है.

हमें समय चाहिए. समय अपने पैरों पर खड़े होने का, जटिल दृष्टिकोण और अपने आप को प्यार करने का समय, हमारे परिप्रेक्ष्य से दुनिया को समझने का समय.

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