आरएसएस, महिलाओं को रोकने की वजह से हमेशा चर्चाओं में रहता है. लेकिन बहुत से लोग नहीं जानते कि रुचि रखने वाली महिलाओं के लिए समानांतर संगठन है. 1936 में महाराष्ट्र के वर्धा में लक्ष्मीबाई केल्कर ने राष्ट्र सेवा समिति की स्थापना की थी. यह संगठन पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वायत्त कहा जाता है, यह आरएसएस की समान विचारधाराओं पर कार्य करता है. हां, आरएसएस का स्वयंसेवक या “स्वयं” महिला संगठन के नाम से गायब है.

हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसा क्यों है कि हमने राष्ट्र सेवा समिति के बारे में बहुत कुछ नहीं सुना है.

कुछ बातें

राष्ट्र सेविका समिति, आरएसएस से जुड़ा संगठन है, जो 82 साल पहले लेट लक्ष्मीबाई केल्कर द्वारा स्थापित की गई थी.
स्वतंत्र महिला संगठन, आरएसएस की समान विचारधाराओं पर चलता है और सदस्यों को तीन आदर्श – मृतुत्व, करत्रुत्व और नेत्रुत्व सिखाता है.

शाखा बैठकें दोपहर के आसपास आयोजित की जाती हैं, ताकि महिलाएं अपने घर के काम पूरा करने के बाद उनसे जुड़ सकें.
समिति के सदस्या सफेद साड़ी या सलवार कमीज पहनते हैं जिसमें गुलाबी रंग का बार्डर होता है.

द इकोनॉमिक टाइम्स के एक लेख के मुताबिक, समिति में हर दिन दोपहर के आसपास और कुछ स्थानों में हफ्ते में तीन बार शाखाएं लगाते है. एक वरिष्ठ सदस्य के अनुसार, आरएसएस में सुबह छह बजे शाखा बैठकें होती हैं लेकिन अधिकांश महिलाओं के पास उन घंटों के दौरान परिवार के लिये काम करना होता है.

वह कहती हैं, “हम मध्य-वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों की महिलाओं के साथ काम करते हैं, जिन्हें सुबह के घंटों के दौरान कई घरेलू काम करना पड़ता है.”  इसलिए समिति अपनी शाखाओं को ऐसे समय में रखती है जब वह सोचती है कि वह समय ज्यादातर महिलाओं के लिए उपयुक्त है.

समिति शाखाओं की कोशिश, विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं के बीच देशभक्ति और सामाजिक जागरूकता की भावना पैदा करना है.

यह अपने सदस्यों को तीन आदर्शों – मतरुतवा (मातृत्व), करत्रुवा (दक्षता और सामाजिक सक्रियता), नेत्रुत्व (नेतृत्व) सिखाता है. इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति और परंपराओं को कायम रखना है.

सफेद कपड़ों  में महिलाएं

ख़ाकी आरएसएस में पसंद का रंग है, लेकिन राष्ट्र सेवा समिति के लिए यह सफेद है. सफेद रंग में गुलाबी बार्डर वाली साड़ियें महिलायें पहनती है,  जबकि लड़कियां सफेद सलवार कुर्ता, गुलाबी बार्डर के दुपट्टे के साथ पहनती है. समिति युवा लड़कियों को शाखा बैठकों में आत्मरक्षा तकनीक भी सिखाती है. नारी जाति की शक्ति को स्वीकार करना भी इनका एक आम विषय प्रतीत होता है.

समिति में शामिल महिलाएं कौन हैं और वे क्या पाना चाहती हैं?

इंडियन एक्सप्रेस ने स्वाती डायाहड्रॉय के पेपर एक्सप्लोरिंग जेंडर,  हिंदुत्व एंड सेवा (एकनामिक एंड पोलिटिकल वीकली साप्ताहिक, 2009 में प्रकाशित) से एक अंश भी प्रकाशित किया है.  डायाहड्रॉय के अनुसार “महिलाओं को तीन प्रकार का प्रतिनिधित्व” मिलता है जब वह आरएसएस जैसे संगठनों में शामिल हो जाते हैं.  “प्रतिनिधित्व का एक रूप उन महिलाओं का है जो अपने हितों से अलग हो जाती हैं और जिनके कार्यों को उनके पुरुष समकक्षों के हितों के साथ माना जाता है. एक अन्य प्रतिनिधित्व होता है जिसमें महिलायें समुदाय की इच्छा की वजह अन्य महिलाओं के साथ होती है, इसमें उनकी किसी भी तरह से विचारों या सिद्धांतों को लेकर कोई वचनबद्धता नही होती है. उसके बाद उन्हें पसंद, दृढ़ विश्वास और अवसरवाद से प्रेरित बातें संगठन से जोड़ देती है.”

संगठन की वेबसाइट के मुताबिक समिति 440 स्वयं सहायता केंद्र और 12 परिवार सलाह केंद्र और महिलाओं के लिए कई सिलाई और बुनाई केंद्र चलाती है. फिर भी, आरएसएस के विपरीत, राष्ट्र सेवा समिति ने अपनी नींव के बाद से बहुत कम सार्वजनिक प्रोफ़ाइल बना रखी है. यही कारण है कि हम इस संगठन के बारे में ज्यादा नही जानते है इसके बावजूद की इसके 5000 ब्रांच है दस देशों में.

 

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