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सोनाली से मिलिए, जिन्होंने भारत भर में मरीजों की सहायता के लिए कैंसर की हेल्पलाइन शुरू की

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सोनाली श्रुंगाराम को 17 साल लग गए यह एहसास होने के लिए कि किशोरावस्था में अपना खुद का कुछ काम करने की वो तीव्र इच्छा सिर्फ एक चलती हुई लहर सी नहीं थी बल्कि उनका प्राथमिक जुनून था। एक दशक से अधिक के लिए तीन देशों (भारत, यूके और न्यूजीलैंड) से एक्सेंचर के लिए काम करने के बाद, उन्होंने सीआईपीएचईआर हेल्थकेयर की शुरूआत की, एक कंपनी जो कैंसर के मरीजों और उनके परिवार और दोस्तों को सभी प्रकार की सहायता प्रदान करने के लिए एक अखिल भारत हेल्पलाइन संचालित करती है। उनकी दृष्टिऑन्कोलॉजी में सेवा प्रदाताओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक रोगी केंद्रित दृष्टि है।

स्वास्थ्य सेवा उद्योग में हमेशा से रूचि होने के कारण, उनके एक करीबी रिश्तेदार के कैंसर के निदान ने सोनाली को महसूस कराया कि कैंसर की देखभाल के संबंध में सेटअप किस तरह विखंडित था।

अपने रिश्तेदार के मामले में, वह बताती है कि हालांकि डॉक्टरों ने लक्षण देखे थे, वे लगातार स्थिति को गलत निदान करते रहे। इसलिए, उन्होंने जागरूकता बढ़ाने और कैंसर के निवारण के लिए  काम करने का फैसला किया।

सोनाली कहती हैं, “हमने 2012 में सीआईपीएचईआर हेल्थकेयर लॉन्च किया था और जागरूकता अभियान शुरू करने के लिए एमएनसी  कंपनियों का दौरा शुरू कर दिया। छह महीनों में, हमने 33 जागरूकता सत्र पूरे कर लिए थे, जिसने हमें इन एमएनसी कंपनियों में लगभग 50,000 लोगों के लिए एक एक्सपोजर दिया था। हमने विशेष रूप से 3000 से ज्यादा लोगों से एक एक करके आमने-सामने बैठकर बात की और 500 से अधिक लोगों की निवारक स्क्रीनिंग में सहायता की।

एक ऐसी स्क्रीनिंग रिपोर्ट के दौरान, हमने देखा कि एक महिला को स्टेज IIB स्तन कैंसर का निदान किया गया था। इस समय, हमें यह कठिन समाचार उन्हें देना था, लेकिन हम अधिक सहायता देने की किसी भी स्थिति में नहीं थे। मेरी अंतरात्मा मुझे उन्हें इस तरह झुकाव में छोड़ने की इजाजत नहीं दे रही थी।

सोनाली परियोजना की विशाल प्रकृति की व्याख्या करती हैं: “कभी कोई व्यक्ति हमें रांची से लागत, योजनाओं और बीमा विवरणों के साथ एक विशिष्ट प्रकार के कैंसर के इलाज के लिए सबसे अच्छा अस्पताल खोजने के लिए फ़ोन करता है। और उसी समय, कुछ ग्राहक हमें यह समझने के लिए फ़ोन करते हैं कि कैंसर को रोकने के लिए वे क्या कर सकते हैं जब उन्होंने अभी अभी धूम्रपान करना छोड़ा है।

कई कॉल हताश परिवार के सदस्यों से भी आते हैं जो अपने रोगी को इलाज के दुष्प्रभावों को झेलते हुए देखकर बहुत चिंतित हो जाते हैं। मुख्य बात यह है कि प्रत्येक मामला अद्वितीय होता है, और हमारा काम प्रत्येक व्यक्ति को उचित सहानुभूति और जानकारी प्रदान करना है ताकि वे सशक्त महसूस कर सकें। ”

उनके लिए स्पष्ट चुनौतियों में से एक तथ्य यह था कि ऑन्कोलॉजी सफलता के लिए एक काफी कठिन क्षेत्र है और ऑन्कोलॉजी प्रबंधन अन्य बीमारियों की तुलना में बहुत मुश्किल है।

इस बीमारी से जूझने के लिए भारत को अभी भी एक लड़ाई से उभरता हुआ माना जा सकता है। एक गैर-चिकित्सा पृष्ठभूमि से इस क्षेत्र में आने के बाद उन्हें विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए बहुत कठिन काम करना पड़ा है। वह कहती हैं, “एक महिला एंटरप्रेन्योर के रूप में, मुझे कई पक्षपातों का सामना करना पड़ा, जिसकी वजह से चीज़ें मेरे लिए और कठिन हो गई। कहीं न कहीं एक धारणा है कि एक पुरुष एन्टेर्प्रेनुएर अपनी नौकरी की पेशकश अधुक समर्पण से कर पाता है, लेकिन एक महिला के पास इसके लिए क्षमता नहीं होती है। मैं धीरे-धीरे इस माहौल में अपना रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रही हूँ।

कैंसर हेल्पलाइन के साथ सबसे बड़ी उपलब्धि यह तथ्य है कि हम 23,000 से अधिक रोगियों को मदद करने में कामयाब रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में, हमे कई विलय और अधिग्रहण के प्रस्ताव आए हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि जिसका निर्माण हमने किया है, वह मूल्यवान है।”

सोनाली एक एन्टेर्प्रेनुएर बनना चाहती थीं इसका एक विशेष कारण यह भी है कि उन्हें खुद के लिए काम करना अच्छा लगता है।

वह कहती है कि उनका समय एक पेशेवर के रूप में बहुत रहा है लेकिन वह अपने समय पर और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए उसपर अधिक नियंत्रण रखना चाहती थी। तथ्य यह है कि कैंसर एक जीर्ण बीमारी है, न की एक संक्रामक बीमारी है, उन्हें लगता है कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा अभी भी रोगियों के समर्थन के लिए तैयार नहीं है।

सोनाली, जो की मरीजों को सेवाएं प्रदान करने के लिए खुद ही सीधा कैंसर के क्लिनिक्स कुछ वर्षों में खोलने की उम्मीद करती हैं, कहती हैं, “एक पुरानी बीमारी वास्तव में पूरी तरह ठीक नहीं की जा सकती है। इसकी प्रकृति ऐसी है कि इसका जोखिम उपचार के बाद भी रहता है। पुरानी बीमारियों के लिए, अनिश्चितता और उपचार की अवधि को देखते हुए, एक मरीज अस्पताल में अपने समय का केवल 20% खर्च कर सकता है और वो भी शेष देखभाल घर पर मिलने की उम्मीद के साथ। न तो हमारे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और न ही रोगी परिवार इस बदलाव के लिए तैयार होते हैं। हमारा ध्यान मुख्य रूप से अस्पताल की देखभाल पर रहा है, हम इस समस्या को कैसे हल करेंगे?

फिलहाल स्वास्थ्य सेवा के एकीकृत प्रणालियों की एक बहुत बड़ी आवश्यकता है – अस्पताल के अंदर उपचार करने वाले डॉक्टर के साथ काम करते समय अस्पताल के बाहर रोगी को मदद करने के द्वारा पूरी तरह से बीमारी से लड़ने में मदद करने वाले संगठनों और व्यक्तियों को ।

फोटो श्रेय: डेक्कन क्रॉनिकल

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