तापसी पन्नू ने 10 जून को सोशल मीडिया पर एनिमेटेड शार्ट फ़िल्म, प्रवासी को इंट्रोड्यूस किया।

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माइग्रेंट क्राइसिस पर है बेस्ड

ये फ़िल्म माइग्रेंट मज़दूरों की व्यथा( grief) और दुखी कर देने वाले चित्र दिखाती है जहां वो पैदल अपने घरों को वापस जा रहे हैं।

ये 1 मिनट 30 सेकंड की फ़िल्म माइग्रेंट मज़दूरों की कहानी शक्तिशाली कविता द्वारा कहती है और इस कविता को आवाज़ दी है तापसी पन्नू ने।

किरीत खुराना की फ़िल्म

T for Taj(फ़िल्म ने इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल्स में तारीफें बटोरी हैं) के फ़िल्म मेकर किरीत खुराना ने कुछ दिनों पहले तापसी को प्रवासी के लिए एप्रोच किया था।

तापसी ने BT को बताया, ” मैं किरीत से फ़िल्म फेस्टिवल में मिली थी। उन्होंने मुझसे हाल ही में कनेक्ट किया और बताया कि माइग्रेंट मज़दूरों के बारे में कुछ बनाना चाहते थे। उनकी इतनी बुरी दशा और जो भी विसुअल्स हमने देखे उसका जो हमपर असर पड़ा है वो किरीत दिखाना चाहते थे। वो चाहते थे कि मैं इस कविता को आवाज़ दूँ।”

विसुअल्स थे दिल दहलाने वाले

तापसी ने बताया कि जब उनकी किरीत से बात हुई तो किरीत ने उन्हें कविता, बैकग्राउंड म्यूजिक और विसुअल्स भेजे। उन विसुअल्स में वो सब कुछ था जो जो माइग्रेंट वर्कर्स के साथ इन दिनों हुआ और वो उनका दिल दहलाने में कारगर थे।

“मैनें न्यूज़ चैनल देखना बन्द कर दिया है क्योंकि मैं नहीं देख सकती उन गर्भवती महिलाओं को , बुज़ुर्गों को और बच्चों के साथ उन परिवारों को जो इतनी तपती गर्मी में पैदल अपना सफर तय कर रहे हैं।”

मैं भी एक माइग्रेंट पर मैं हूँ लकी

तापसी कहती हैं,” एक तरह से मैं भी मुम्बई से नहीं हूं। मैं भी यहां काम के लिए आई हूं पर मैं लकी हूँ कि मेरे पास घर है और सारी सुविधाएं हैं। मुझे इतनी जल्दीबाज़ी में घर वापस जाने की ज़रूरत नहीं है। पर माइग्रेंट ऐसे हैं जिनके पास घर वापस जाने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है।”

कैसे करी शूटिंग

तापसी से जब पूछा गया कि उन्होंने कैसे ये कविता रिकॉर्ड की तो उन्होंने बताया कि सबसे पहला शॉट था जब एक बच्चा अपनी मरी हुई मां को जगाने की कोशिश कर रहा था। इसे देख कर कुछ देर वो आगे ही नहीं बढ़ पायी।

“पर मुझे पूरी फ़िल्म देखनी थी और मैंने देखी। हम एक इंसान होने के नाते ये समय हमेशा याद रखेंगे। इस पान्डेमिक ने सिर्फ मेडिकली एफेक्ट ही नहीं किया है बल्कि हमारे आसपास ह्यूमन ट्रेजेडी का माहौल बना दिया है।”

इंसानियत पर सवाल

“माइग्रेंट मज़दूरों को एकसाथ लाकर उन्हें डिसिन्फेक्ट करना जैसे वो ऑब्जेक्ट हों और उनके साथ इतना गलत ट्रीटमेंट करना, दिखाता है कि इंसानियत खत्म होचुकी है।” तापसी कहती हैं।

“मैंने माँओं को उनके बच्चों द्वारा ही घर से बाहर निकालने वाले विसुअल्स देखे हैं। एक तरफ हम विकास और सुपरपावर बनने की बात करते हैं दूसरी तरफ हमारे देश मे किसी की ज़िंदगी की कोई कीमत ही नहीं है।”

बोलने की बातें और असलियत में अंतर बताती ये फ़िल्म

तापसी बताती हैं कि ये कविता हम क्या एक्सपेक्ट करते हैं और असल में होता क्या है का डिफरेंस दिखाती है।

“मैंने कुछ ऑप्शन्स रिकॉर्ड करे हैं कविता के लिए। मैं आशा करती हूं कि मैं शब्दों और विसुअल्स के साथ जस्टिस कर पाऊँ।”

Courtesy: Times Of India

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