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जानिए कैसे अंजुमन फ़ारूक़ थांग-ता मार्शल आर्ट की पहली ब्लैक बेल्ट बनीं

Published by
Udisha Shrivastav

थांग-ता मार्शल आर्ट को जीतने वाली अंजुमन फ़ारूक़ भारत की पहली ब्लैक बेल्ट बनीं हैं। उन्होंने पिछले साल ही थांग-ता मार्शल आर्ट के अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में यह ब्लैक बेल्ट प्राप्त कर शौहरत कमाई। अंजुमन 18 वर्षों से एक मार्शल आर्ट एक्सपर्ट हैं और श्रीनगर की रहने  वाली हैं। वे वहां एक शारीरिक शिक्षा लेक्चरर के रूप में काम करती हैं। वे अपने स्वर्गवासी पिता से प्रेरित हैं। आने वाले मार्च के माह में वे थांग-ता विश्व कप 2019 में हिस्सा लेंगी।

“इस कला में मुझे एक तलवार पकड़ने की ज़रूरत है। मैं किक, पंच और असली तलवार जैसे उपकरणों का उपयोग करके खुद को शक्तिशाली महसूस करती हूँ”।

कक्षा चार में उन्होने टायक्वोंडो में सिल्वर मैडल जीता था और कक्षा आठ में उन्हें राज्य प्रतियोगिता में बेस्ट एथलिट घोषित कर दिया गया था। उनके पिता एक खिलाडी थे जिन्होंने हमेशा उनका समर्थन किया। कक्षा छह में उन्होंने यह एहसास किया कि वे थांग-ता में एक्सपर्ट होना चाहती हैं। वे अभ्यास के लिए स्टेडियम जाया करती थीं और सुबह के वक़्त अपने पिता के साथ खेलती थीं।

“मैंने अभी तक पंद्रह राष्ट्रीय और चार फेडरेशन कपों में खेला है। मैंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक भी जीते हैं”।

स्पोर्ट्स करियर का चयन

“मैं बचपन से ही स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में अपना करियर बनाना चाहती थी। और थांग-ता ने मुझे वह उत्साह दिया। मैंने इस आर्ट को पिछले 18 वर्षों तक खेला है”।

“मेरे पिता ने मुझसे कहा कि खेल के समय खुद को एक खिलाडी की तरह सोचो न की किसी लिंग के आधार पर”।

चुनौतियों का सामना

“जम्मू कश्मीर में कोई थांग-ता अकादमी नहीं है। लड़कियां इस क्षेत्र में रूचि रखें, यह थोड़ा मुश्किल है क्यूंकि समाज किसी स्पोर्ट को लिंग के आधार पर देखता है”।

“मैं एक बहुत परंपरागत समाज से आती हूँ। करियर के शुरुआत में ज्ञान की कमी के कारण मुझे किसी ने समर्थन नहीं दिया। लेकिन, मेरे माता-पिता ने हमेशा आगे आकर मेरी मदद की”।

सबसे बड़ी चुनौती

‘मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती किसी स्पोंसर को ढूंढ़ने की थी। मैं अपने घर की अकेली कमाऊ सदस्य हूँ क्यूंकि मेरे पिता का पिछले ही वर्ष निधन हो गया था। मेरे पास अपने परिवार के चार सदस्यों की ज़िम्मेदारी है। मुझे काम और अपने पैशन को साथ में संभालना पड़ता है। मैंने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर खेला पर किसी ने भी मुझे स्पोंसर नहीं किया। मैं अपनी अकादमी खोलना चाहती हूँ और अभी भी फंड्स की तलाश में हूँ”।

“अपने दिल की सुनना आसान है लेकिन उसका एक मूल्य होता है”।

भारत की स्तिथि

“भारत में नौकरियों की सुरक्षा, उपयुक्त प्रोत्साहन, और सुविधाएं नहीं हैं। मैं एक अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक विजेता हूँ लेकिन सरकार की तरफ से मुझे कोई प्रोत्साहन नहीं मिला है। हमारे राज्य में न अकादमियां और बुनियादी ढाँचे हैं, न कोई प्रोत्साहन है”।

अंजुमन फ़ारूक़ अपने आगे आने वाले करियर में इस काबिल बनना चाहती हैं ताकि वे अन्य लोगों को भी ट्रेनिंग दे सकें। वे अपने इस स्पोर्ट को और आगे तक लेकर जाना चाहती हैं।

महिलाओं पर चर्चा करते हुए अंजुमन ने कहा कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और पुरुषों के साथ कन्धा मिलकर अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। अब उनके राज्य में भी यह दृश्य बदल रहा है।

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