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क्यों किया जाता है महिला खिलाड़ियो को नज़रअंदाज़?

Published by
Jayanti Jha

महिलाओं का योगदान खेल के मैदान में काफी अच्छा रहा। पी टी उषा से लेके झूलन गोस्वामी ने खेल में महिलाओं को एक पहचान दी। आज की तारीख में हर तरह के खेल में महिलाओं की एक एहम भूमिका है। क्रिकेट, हॉकी से लेके बैडमिंटन तक हमारी महिला खिलाड़ियो ने हमारे देश का नाम ऊंचा किया। वो हमारे लिये काफी ट्रॉफीज लायी और दूसरे देशों में जाके अपनी प्रतिभा से सबका मन जीता। इतना सब कुछ करने के बाद भी हमारे देश में जितनी प्रसिद्ध पुरुषों की क्रिकेट टीम है, दूसरी तरफ महिलाओं की क्रिकेट टीम पे ध्यान नही दिया जाता। काफी बार ये देखा जाता है की इन्हें ज़रूरी सुविधाएं भी नही मिलती।

इस भेद का कारण

दंगल एवं क्रिकेट को हमेशा से एक पुरष आधारित खेल के रूप में देखा गया। घरो में लड़कियों का खेल खेलना पुरुषत्व व्यवहार के रूप से देखा गया। महिलाओं के खेलों को हमेशा से एक माध्यमिक या सेकेंडरी रूप में देखा गया। कुछ महिला खिलाड़ियो को लेस्बियन के रूप में देखा गया क्योंकि वो समाज के जेंडर रोल पे नही चलते। क्यों की समाज ने एक औरत की निशानी कमज़ोर और नाज़ुक के रूप में देखा , खेलो मे आने वाली महिलाओं को एक घुसपैठ की तरह देखा गया।

खेल समिति की ओर से

फंडिंग या पैसे देने के नामपे फेडरेशन या खेल समिति की और से ज़्यादा योगदान नहीं है । जहां पुरषों की टीम को इतनी फंडिंग मिली वही एक दिन खबर में आया कि एक नेशनल महिला खिलाड़ी ट्रेन में जमीन पे सो रही थी अपने अगले मैच की जगह तक जाने के लिए। अक्सर ये पाया जाता है कि महिला टीम खेल अपने पैसे देके खेलती है। दंगल फ़िल्म ने इस बेड़ी को बहुत अच्छे से समझाया है। हरयाणा में जब गीता फोगाट ने इंटरनेशनल लेवल पे जाके मैडल जीता तभी हरयाणा में महिला कुश्ती का प्रचलन बढ़ा और फंडिंग दी गयी।

क्रिकेट का हाल

वही क्रिकेट में जहां पुरुष क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली के चर्चे है, महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिथाली राज के बारे में काफी कम लोग जानते है। इस जगह फंडिंग की ही नही बल्कि मीडिया की भी गलती थी। जहां लोगो ने इस टीम को भाव नही दिया उसी तरफ मीडिया ने भी इस टीम पे ध्यान नही दिया। जब पिछले साल इंग्लैंड से भारत फाइनल हारी, इस टीम को मीडिया और सोशल मीडिया ने काफी प्रोत्साहित किया। अब क्रिकेट में महिला टीम के दर्शक बढ़ रहे है और क्रिकेट अब सिर्फ पुरुषों का खेल नही रहा।

कैसे खुद ही इन लोगो ने अभयास किया

ओलंपिक्स में एक मैडल पाने से चुकी महिला जिम्नास्ट दीपा कर्मकार ने अपने इंटरव्यू में बताया कि कैसे जिम्नास्ट करने के लिए उनके कोच ने गड्ढे खरीदे और तब उन्होंने उसपे प्रैक्टिस की। वही मैरी कॉम को भी एक अच्छा शिक्षण नही मिल पाया और उनको उनके कोच ने मणिपुर में अपने छोटे से रिंग में अभ्यास करवाया। अतलेटिक्स में हिस्सा लेनी वाली महिला खिलाड़ी हिमा दास को मैराथन दौड़ में पानी तक नही दिया गया जबकि दूसरी खिलाड़ियो को पूरी तरह से मदद मिली।

बैडमिंटन में भेद भाव

जहां सब कुछ है , फंडिंग और मीडिया का ध्यान, बैडमिंटन, वहां ज्यादा ध्यान महिला खिलाड़ी के खेल पे नही बल्कि उसके खेल की तुलना दूसरी महिला खिलाड़ी के साथ की जाती है। पुरुष के खेलों में ये कम देखने को मिलता है। पी.वी. सिंधु और साइना नेहवाल के खेल की तुलना बहुत की गई जबकि दोनो एक ही देश के है और दोनों के खेलने का तरीका अलग है। कई बार इन खिलाड़ियों को उनके रूप और शरीर के आकार पे भी आंका जाता है।

इस भेद की सुधार

ये प्रचलन कम तो हो रहा है पर हमें ये समझने की ज़रूरत है कि महिलाओं का खेल में भी बेहतरीन भविष्य हो सकता है। और ये ही महिलाओं को सामाजिक बंधनो से आज़ाद करता है। इनकी सहायता हर तरह से करनी चाहिए ताकि भारत को और पी टी उषा और मनु भास्कर मिले।

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