बाल विवाह की रीती भारत में काफी सदियों से प्रचलित है। यूनिसेफ के अनुसार बाल विवाह भारत में अब कम हुआ है पर आज भी 1.5 लाख लड़कियों की शादी 18 साल के पहले हो जाती है। बाल विवाह देश में काफी समय से प्रचलन में है। इसका इतिहास उस समय से शुरू होता है जबसे मध्यकालीन भारत में समाज का एक नया रूप सामने आया और लड़कियां अब अपने परिवार की इज़्ज़त बन चुकी थी और उन्हें उनके परिवार का कहना मान ना पड़ता था। क्यूंकि नौजवान लड़कियां गैर जिम्मेदार और तर्कहीन थी, उनकी शादी पहले ही कर दी जाती थी, इससे पहले ही वो किसी से प्रेम करें।

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मध्यकालीन युग में , ये आयु और कम होती गयी और ये माना गया कि अगर दो लोग एक दूसरे को बचपन से जानते है और समझते है तो विवाह इस प्यार और समझ को और बढ़ा देगा। हालांकि बेटी घरों में ही रहती थी जब तक वो 12 आयु की हो। इस आयु में आने के बाद उसका विवाह करा दिया जाता था। आज के समय में , बाल विवाह के तौर तरिके बदल चुके है, शादी बचपन में ही तय करदी जाती है पर ज़रूरी नही है कि लड़का, लड़की के ही उमर का हो, वे उससे बड़ा हो सकता है। और ऐसे विवाह के बुरे परिणाम होते है।

भारत में बाल विवाह का प्रचलन और इसके कारण

प्राचीन भारत में विवाह के आठ रूप होते थे; ब्रह्न विवाह में लड़की का विवाह एक वेद ज्ञानी पुरूष से किया जाता था , इस विवाह में दहेज नही लिया जाता था और लड़की की आयु बड़ी होती थी। अर्श विवाह में लड़की की शादी उसके आयु से बड़े इंसान से करदी जाती थी, असुर विवाह में लड़का लड़की से विवाह करने पर ऊँची रक़म देकर विवाह करता था। इन आठ तरह के विवाह मे कुछ आज भी प्रचलन में हैं ,जो की आज के ज़माने के बाल विवाह का आधार बनते है। इनके अनुसार हुए विवाह को परंपरा मे गिना जाता है। वेद के अनुसार बाल विवाह पे रोक है किंतु ये परंपरा समाज के उनलिखत नियमों के अनुसार मानी जाती है।

आज के समय मे , 40% बाल विवाह भारत में कराए जाते है, इसके कारण कई है जोकि माता -पिता की कम आमदनी से लेकर दबाव के कारण हो सकता है। अक्सर ये देखा जाता है कि राजस्थान और हरियाणा के राज्यों में लड़कियों को एक बोझ समझ के या तो उन्हें पेट में ही मार देते हैं, या तो उनकी शादी एक कच्ची आयु में कर देते है। वो ऐसा कदम इसलिए उठाते है क्योंकि परिवार की आर्थिक स्तिथि सही नही होती और परिवार वालों को बेटे को पढ़ना होता है क्योंकि उनके अनुसार बेटे ही उनके बुढापे का सहारा होते है। देखा ये जाता है कि स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों को दसवीं के बाद ही विवाह के बंधन में बाँध दिया जाता है, इसके पीछे का कारण अक्सर ये होता है कि कैसे एक लड़का उसका पीछा करता है या उसके साथ कुछ गलत करता जिसके कारण परिवार अपनी इज़्ज़त बचाने के खातिर लडकी का विवाह करवा देते है।

गांव-देहात में जहां कुछ परिवारों में आर्थिक तंगी होती है, वहाँ लड़की का विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से करवा दिया जाता है जो कि परिवार की आर्थिक रूप में सहायता करने का दिलासा देता है। भारत सरकार के बाल विवाह के विरुद्ध निकले गए बिल के बाद भी इस का खंडन नही हुआ है। जिन जगहों पे खाप पंचायतों का नियम है ,उन जगहों पे इसका और प्रचलन है। वहाँ अगर कोई लड़का किसी भी लड़की के साथ गलत करे, चाहे वो छोटी हो या बड़ी, उसकी इज़्ज़त बचाने के नाम पर ये निर्णय लिया जाता है कि उसकी शादी उसी लड़के से होगी। बाल विवाह का प्रचलन अभी भी इतना है कि इसे आज भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है, जबकि सच ये है कि वेद भी इसके खिलाफ है।

बाल विवाह से मुक्ति पाने के लिए लड़कियों को पढ़ना और सशक्त बनाना बहुत ज़रूरी है। उन्हें ये पता चले कि ये कानूनी तौर से गलत है एवं उनके लिए हानिकारक है।

इसके दुष्परिणाम

जब एक कम आयु की लड़की का विवाह होता है , तो इससे मातृ मृत्यु दर यानी कि फीमेल मोर्टेलिटी का दर बढ़ जाता है और आज एक औरत हर सात मिनिट में प्रेगनेंसी के कारण मर जाती है। कम आयु की लड़कियों का विवाह में शारिरिक शोषण होता है जबकि वो शारिरिक या मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नही होती। इसके कारण लड़कियों को कई तरह की बीमारी हो सकती है ।

10-14 साल की लड़कियों अपने प्रेग्नेंसी के दौरान बच नही पाती अगर उनकी तुलना 20-24 साल की औरतों से करें। अगर ये लड़कियां माँ बन भी जाती है तो ये मानसिक रूप से बच्चे को संभालने के लिए तैयार नही होती जिसके कारण उनके मानसिक कल्याण ,शादी को देखना का तारिका बदल जाता है। ऐसे ही परिवरों में घरेलू हिंसा को भारी तादात में देखा जाता है। बाल विवाह को तलाक़ या बिछड़ने से भी जोड सकते है और विधवा होने का प्रतिशत उन मामलों में ज्यादा हो जाता है जहां पति की आयु ज्यादा हो। इसके कारण उसे समाज के ताने या समाज से अलग किया जा सकता है एवं परिवार का सारा बोझ उस पे आ जाता है।

बचाने के तरीके

बाल विवाह से मुक्ति पाने के लिए लड़कियों को पढ़ना और सशक्त बनाना बोहोत ज़रूरी है। उन्हें ये पता चले कि ये कानूनी तौर से गलत है एवं उनके लिए हानिकारक है। उनके इस ज्ञान से परिवारों के सोच में परिवर्तन आ सकता है और इस परंपरा को खत्म किया जा सकता है। आखिर में एक लड़की के पढ़ने से पूरा परिवार पढ़ता है और आगे बढ़ता है।

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