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बाल शोषण पीड़ितों को माता-पिता के समर्थन की आवश्यकता होती है, न कि उनके विश्वासघात की

Published by
Udisha Shrivastav

बाल शोषण पीड़ितों को मानसिक और शारीरिक तौर पर माता-पिता की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है। यह बच्चे उस दर्दनाक अनुभव को पूरी तरह से नहीं समझ पाते। साथ ही, कंडीशनिंग और धमकियां उन्हें बोलने से रोकती हैं। इसी कारण, बच्चे चुप्पी साध कर सब कुछ सहते रहते हैं। लेकिन जो बच्चे सामने आने की हिम्मत करते हैं, वे अपने माता-पिता के समर्थन की उम्मीद ज़रूर करते हैं। लेकिन क्या किया जाये जब उनके माता-पिता ही शत्रुता पर उतर आएं? क्या होगा अगर वे अपनी सामाजिक छवि को ज्यादा महत्व देंगे?

कुछ टेकअवे

बाल शोषण पीड़ितों के पास क्या रास्ता बचता है, जब उनके माता-पिता सामाजिक छवि को ज्यादा महत्व देते हैं?

बाल शोषण, भारी मात्रा में परिवार, दोस्तों, और रिश्तेदारों के हाथों होता है।

रिसर्च के अनुसार दो-तिहाई बाल शोषण अपराध, परिवार और जानने वालों के हाथ होते हैं।

कोयम्बटूर की 13 वर्ष की बालिका का मामला यह सोचने पर मज़बूर करता है कि कैसे बाल शोषण से पीड़ित बच्चे माता-पिता के धोखों से डील करते हैं।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया (TOI) के मुताबिक एक 13 वर्षिय बालिका अपने 18 वर्षीय भाई के बलात्कार किये जाने से गर्वभती हो गयी। जब उसके माता-पिता को यह पता चला, तो वे अपनी बेटी का गर्वपात कराने के लिए उसे एक निजी अस्पताल में ले गए। लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें कोयम्बटूर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल जाने की सलाह दी। इसके बाद डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि वह आठ महीने की गर्वभती है और साथ ही पुलिस को भी सूचित कर दिया। लेकिन, उसके माता-पिता ने, न सिर्फ बाल संरक्षण सोसाइटी के साथ सहयोग करने से इंकार कर दिया बल्कि अपने बेटे के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से भी मना कर दिया।

लेकिन अंत में, उस बालिका ने खुद ही शिकायत दर्ज़ की। और उसके माता-पिता ने अपने बेटे का ही सहयोग किया। यह जानते हुए कि एक निश्चित समय के बाद गर्वपात करवाना जोखिम भरा हो सकता है, उसके माता-पिता ने इसकी परवाह नहीं की। वह सिर्फ अपने परिवार को घोटाले से बचाना चाहते थे। और यह कहानी देश भर के बाकि माता-पिताओं से मिलती-जुलती है।

यह कारण है कि हमारे देश के बाल शोषण के इतने मामले रिपोर्ट नहीं होते। क्यूंकि एक बड़ी मात्रा में बाल शोषण परिवार, परिचितों, और रिश्तेदारों के हाथ होता है।

हम समाचार पत्रों और दोस्तों के बीच इन घटनाओं के बारे में सुनते हैं। लेकिन जब इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, तब परिवार के लोग सबसे पहले इन चीज़ों पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं। इसके चलते, वे अपने ही बच्चों के साथ विश्वासघात कर देते हैं। उनकी सामाजिक छवि और रुतबा ज्यादा एहम होता है।

लेकिन क्या वह बच्ची अपने माता-पिता को माफ कर पायेगी? उस लड़के का एक व्यसक होते हुए कानूनी कार्यवाही से दूर रखने के लिए? लेकिन यह माता-पिता द्वारा हुए विश्वासघात का अकेला मामला नहीं होगा।

पितृसत्ता का ऐसा प्रभाव है कि हम पारिवारिक सम्मान के आगे नहीं सोच पाते। और क्यूंकि युवा लड़कियों के पास गर्भ है, वे इन मामलों में अपनी गरिमा और विश्वास को खो देती हैं।

इस तरह के मामले, हाल ही में राजस्थान और पंजाब से भी सामने आये हैं। इसके चलते बहुत लड़कियों को जोखिम भरे गर्वपातों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों ने सामाजिक शर्म और शारीरिक शोषण के कारण अपने रक्त सम्बन्धियों को बचाया भी होगा।

जो लोग लड़कर सामने आते हैं, उनके लिए यह हमेशा मुश्किल भरा होता है। ज़रूरी है कि जो संगठन बच्चों को दुर्व्यवहार से बचाने के लिए काम करते हैं, वे उनके माता-पिताओं के बीच जागरूकता फैलाएं। उन्हें समझाएं की बच्चों की भलाई और न्याय सामाजिक छवि से ज्यादा ज़रूरी है। वह चुप रहकर, बाकी बच्चों को दुर्व्यवार के लिए संवेदनशील न बनायें। और सही-गलत का चुनाव ठीक से करें।

 

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