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मिलिए भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, ए ललिता से

Published by
Ayushi Jain

चार महीने की बेटी के साथ एक किशोर विधवा होने से लेकर, भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनने तक का ए. ललिता का जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं है। 27 अगस्त, 1919 को मद्रास (चेन्नई) में जन्मी ए ललिता पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और विज्ञान और टेक्नोलॉजी के बारे में अधिक जानना चाहती थी। उनके पिता इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे, जिसके कारण इलेक्ट्रॉनिक्स में उनकी रुचि ज़्यादा बढ़ी । उनके चार बड़े और दो छोटे भाई-बहन थे और सभी इसी क्षेत्र में थे।

मुख्य बातें

  1. ए. ललिता भारत की पहली महिला इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थीं।
  2. उनकी शादी 15 साल की उम्र में हुई थी और जब वह 18 साल की थी और उनकी एक चार महीने की बेटी थी, तभी उनके पति की मृत्यु हो गई थी ।
  3. उन्होंने अपनी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री अल्मा मेटर, कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, गुइंडी (सीईजी ), मद्रास यूनिवर्सिटी से पूरी की।
  4. ललिता ने 1964 में “महिला इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन” में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

भारत में बीसवीं सदी की शुरुआत में बाल विवाह काफी आम बात थी, ए। ललिता की शादी 15 वर्ष की उम्र में हुई थी। उन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया और एक महिला के रूप में उस युग में कई विचारों को आगे बढ़ाने का विकल्प चुना। उनकी इलेक्ट्रॉनिक्स में काफी रूचि थी पर उस समय इलेक्ट्रॉनिक्स को एक “एक आदमी का काम” माना जाता था , लेकिन ललिता को कुछ भी रोक नहीं पाया। इस कोर्स को करने वाली पहली महिला होने के नाते, कॉलेज प्रशासन को भी उनकी सफलता के आगे महिलाओं की ऊंचाइयों का लोहा मानना पड़ा। अपने परिवार के समर्थन के साथ काम और घर के बीच संतुलन बनाकर सभी बाधाओं को झेलते हुए उन्होंने एक प्रेरणादायक जीवन जीया हैं।

ए. ललिता अपने कोर्स की एकमात्र महिला छात्रों में से एक थीं, और कॉलेज में दो अन्य लड़कियां सिविल ब्रांच से थीं।

एक किशोर विधवा ललिता सिर्फ 15 साल की थीं, जब उनकी शादी 1934 में हुई थी। उनकी शादी के बाद, उन्होंने 10 वीं कक्षा तक पढ़ाई जारी रखी। शादी के तीन साल बाद, 1937 में 18 साल की ललिता और 4 महीने की बेटी सियामाला को छोड़कर उनके पति की मृत्यु हो गई। दुनिया आज भी विधवाओं की तरफ दयावान नहीं है और यह तब भी बदतर थी, लेकिन सभी बाधाओं को चुनौती देते हुए, उन्होंने अपनी पढ़ाई से खुद को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाए रखने का फैसला किया। अपने परिवार के समर्थन के साथ, ललिता ने चेन्नई के क्वीन मैरी कॉलेज से प्रथम श्रेणी के साथ अपनी मध्यवर्ती परीक्षा पूरी की।

इस कोर्स को करने वाली पहली महिला होने के नाते, कॉलेज प्रशासन को भी महिलाओं की सफलता का लोहा मानना पड़ा ।

इस शानदार प्रदर्शन के बाद, उन्हें पता थी कि वह अपने पिता और भाइयों के नक्शेकदम पर चलना चाहती थी। वह इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई  करना चाहती थी क्योंकि मेडिकल जैसे अन्य क्षेत्रों ने उन्हें ज़्यादा आकर्षित नहीं किया जितना कि इलेक्ट्रॉनिक्स ने किया। यहां तक ​​कि ललिता जैसे प्रतिभाशाली छात्र के लिए, किसी भी इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश लेना आसान नहीं था क्योंकि यह 1900 के दशक की शुरुआत में था और इलेक्ट्रॉनिक्स का क्षेत्र एक पुरुष प्रधान क्षेत्र मन जाता था। सौभाग्य से उनके पिता पप्पू सुब्बा राव सीईजी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे। उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने में उनकी मदद की।

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