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मिलिए 17 साल की फिल्म – मेकर नंदिता आनंद से

Published by
Ayushi Jain

स्पोर्ट्स में दुनिया को बदलने की एक अद्भुत ताकत है। खो-खो और कबड्डी से लेकर सॉकर और क्रिकेट, खेल के माध्यम से हम खुद को सशक्त बना सकते है। न केवल खेल खिलाड़ियों को एकजुट करता है, बल्कि यह लोगों में एक नया आत्म -विश्वास जगाता है। हालाँकि भारत में पुरुष महिलाओं के मुकाबले स्पोर्ट्स में ज़्यादा नज़र आते है क्योंकि महिलाओं पर बहुत पाबंदियां होती है ।नंदिता आनंद, एक 17 वर्षीय फिल्म निर्माता जो इस बदलाव को ट्रिगर करने के लिए तैयार है। मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी नन्दिता अभी बॉम्बे में हिल स्प्रिंग इंटरनेशनल स्कूल में आईबीडीपी कार्यक्रम परस्यु कर रही है। नंदिता एक नेशनल लेवल एथलिट रह चुकी है और अपने स्कूल के दिनों में 100 मीटर और 200 मीटर  की रेस दौड़ चुकी है। पर अब वो एथलिट नहीं है ।

उनकी शार्ट फिल्म रेडी सेट गर्ल इस बात का बखूबी संकेत कर रही है कि कैसे महिला एथलीट किस तरह की ज़बरदस्त ट्रेनिंग और कम्पटीशन से गुजरती हैं उसी प्रकार जिस प्रकार पुरुष किसी भी खेल में जीतने के लिए तैयारी करते हैं.  नंदिता ने शीदपीपल से बात की कि उन्होंने महिलाओं और खेल पर इस फिल्म को बनाना ही क्यों चुना और इस पर क्या प्रतिक्रियाएं आईं।

महिला एथलीटों के सामने प्रमुख चुनौतियां

महिला एथलीटों के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि मुझे लगता है कि पुरुष एथलीटों का वेतन सुनिश्चित है। एक महिला फुटबॉल खिलाड़ी को एक वर्ष में 1 मिलियन डॉलर मिलता है, जबकि एक पुरुष खिलाड़ी की तुलना में जिसे एक वर्ष में 20 मिलियन डॉलर दिया जाता है, भले ही दोनों ही व्यक्ति उस स्तर तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।

लड़कियों को स्पोर्ट्स में आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन केवल एक निश्चित उम्र तक और युवावस्था पार करने के बाद, आधे से अधिक लड़कियां अलग – अलग कारणों से खेल से बाहर हो जाती हैं।

एक और मुद्दा जिसका  मुझे लगता है कि महिला एथलीटों को सामना करना पड़ता है, विशेष रूप से भारत में वो है शौचालय। एथलेटिक मीट में शौचालय सिर्फ अनुपयोगी हैं। उनके पास स्टॉल या कोई सुविधाएं नहीं हैं और वे हमेशा गंदे रहते हैं। यह बेहद मुश्किल होता है, खासकर जब एक लड़की अपने पीरियड पर होती है और उसके लिए मुकाबला करना भी असंभव हो जाता है। ऐसा ज्यादातर इसलिए होता है क्योंकि बाथरूम की सुविधाओं को बनाने और साफ़ रखने के लिए आम तौर पर आयोजकों के पास ज्यादा पैसा नहीं होता है।

बदलाव

महिलाओं के खेल को वर्तमान परिदृश्य में मैं कुछ बदलना चाहूंगा, इसके प्रति यंगस्टर्स का रवैया और बहुत सारे युवा लड़के इसे मजाक के रूप में लेते हैं और मुझे अपनी फिल्म के माध्यम से उनमे बदलाव की उम्मीद है।

लोगो को सन्देश

मेरी जैसी फिल्मों के माध्यम से, उम्मीद है, हम लोगों को यह समझा सकते हैं कि महिला एथलीट होना क्या है और उन्हें अधिक स्वीकार करना सिखाएं। यह भी अधिक महिलाओं को एथलेटिक्स लेने के लिए प्रोत्साहित करेगा और महिला स्पोर्ट्स के बारे में जानकारी के लिए अधिक जगह  के साथ, दर्शकों की संख्या भी बढ़ेगी।

 

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