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लड़का-लड़की दोनों रो सकते हैं। यह समझना इतना कठिन क्यों है ?

Published by
Harshita Pandey

कॉलेज की छुट्टियों में कुछ ही दिन के लिए सही, मगर घर जरूर आती हूँ । घर पर दिनभर चाहे कितनी ही बिज़ी रहूँ या खाली मगर शाम को आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलना जरूरी-सा लगता है और पहुँच जाती हुँ उनके पास। इन बच्चों की उम्र 6 से 12 साल के बीच की है, और इस कारण इनको सबकी मर्जी का एक गेम तय करने में काफी समय लग जाता है। कभी छोटो के मन का करना होता है तो कभी बड़ों के मन का, और फिर तमाम हल्ले-गुल्ले के बाद आखिर में गेम डिसाइड हो ही जाता है।

एक दिन आधे-घंटे तक गेम डिसाइड करने के बाद, जब हम टीम बाँट रहे थे, तो मेरे हिस्से छोटे बच्चे ज्यादा आए। इन छोटे बच्चों को पूरा गेम और उसके रुल्स समझाने के बाद, हमनें मैच खेला और उसमें हमारी टीम हार गई । हम हार गए हैं, ऐसा समझते ही मेरी टीम का एक छोटा बच्चा रोने लग पड़ा। और लाज़िम भी है, बिचारे ने मेहनत भी खूब की थी।

उसको रोता देख सारे बच्चे हँसने लगे और एक ने कहा – ‘दीदी तो गर्ल होकर भी नहीं रो रही, और तू बॉय होकर रोता है…..।’ मैं अब अपनी हार को भूल यह सोचने लगी थी कि इतनी-सी उम्र में ये बच्चे ऐसा सब सोच कैसे लेते हैं, और फिर अपनी चुप्पी तोड़ मैंने उससे पूछ ही लिया। बच्चे का जवाब बेहद सरल था – ‘अरे!! मेरी मम्मी कहती हैं, बॉयज टफ और पावरफुल होते हैं इसलिए उनको रोना नहीं चाहिए।’ और इतना कहते ही वो , दूसरे बच्चों के साथ अगले गेम की प्लैनिंग करने में लग गया।

क्या लड़कियां टफ नहीं हो सकती ? क्या रोना एक कमजोरी है ? अगर रोना कमजोरी ही है तो उसे केवल  लड़कियों से क्यों जोड़ा जाता है ? तमाम ऐसे प्रश्न है जिनका सार्थक उत्तर ढूँढने की हमें बेहद जरूरत है ताकि हमारे बाद वाली पीड़ी को हम गलत चीजें न सिखाएँ।

सब रो सकते हैं, यह जानना और मानना जरूरी है।

हमारे समाज मे माना जाता है कि केवल एक कमजोर ही रोता है। साथ-ही समाज महिलाओं को एक कमजोर जेन्डर के रूप में दिखाता है। और इस कारण हर कमजोर गुण को महिलाओं से जोड़ दिया जाता है और बेबाक होकर बोला जाता है – ‘केवल महिलायें ही रोती हैं।’

ऐसी सोच न केवल महिलाओं के लिए घातक होती है बल्कि पुरुषों को भी मानसिक प्रताड़ना देती है। जब भी कोई पुरुष रोता है तो सब उसकी मज़ाक उड़ाते हैं और उसको ‘औरत’ कहकर चिड़ाने लगते हैं। या फिर अलग-अलग डाइलॉग बोलते हैं जैसे – ‘रोना तो लड़कियों का डिपार्ट्मेंट है, तू क्यों रो रहा है’ ‘अरे!! तू लड़कियों की तरह क्यों रो रहा है।’ अब भले ही ऐसे डाइलॉग कुछ लोग केवल मजाक में लेते हो, मगर असल में यह ‘मूर्खता’ है।

हमारे लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि हमारे तमाम ईमोशन में से रोना भी एक है। और कोई भी व्यक्ति रोकर अपने दुख/खुशी को बयां कर सकता है, इसलिए रोने को किसी एक जेन्डर का गुण बताना, कहीं से कहीं तक तर्कसंगत नहीं। साथ ही, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति जब रोता है, तो उसके कई कारण हो सकते हैं। और ऐसे वक्त में उस इंसान का साथ देना छोड़कर, उसको चिड़ाना, इंसानियत पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है।

आप रोते हैं, तो ये आपकी ताकत है ।

किसी के रोने को कभी उसकी कमजोरी न समझें। अपने दुख में तो कभी दूसरे को दुख में देखकर अगर कोई रोता है, तो यकीनन ही वो एक सक्षम इंसान हैं। क्योंकि उस इंसान में अपने ईमोशन को बिना किसी के डर के दिखाने की हिम्मत हैं। कभी-भी यदि आपका मन उदास हो, हालात खराब नज़र आ रहे हों तो केवल शर्म के कारण अपने अंदर ही अंदर घुटते न रहें, दिल खोलकर एक बार रोएँ और फिर जब मन हल्का हो जाये तो हिम्मत के साथ आगे बढ़ें। फिर देखना चीजें अपनेआप सुलझती दिखेंगी।

रोना कोई शर्म की चीज़ नही है और ना ही किसी एक जेन्डर के लिए है। यह बस एक सामान्य ईमोशन है जिसको हमें सामान्य तौर पर ही लेना चाहिए। साथ-ही बच्चों को भी इस शर्म से दूर रखना चाहिए, ताकि वो कभी-भी अपने ईमोशन न छुपाएँ और किसी दूसरे को रोता देख उसे चिड़ाए नहीं।

कहानी की एक होपफुल बात  –

जब उस रोते हुए छोटे बच्चे को सबने चिड़ाया था तो उसने कहा – ‘हर कोई रोता है, इतना भी नहीं पता।’

पढ़िए : घर पर Gender Equality को बढ़ावा देने के 10 तरीके

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