दिल्ली को नई दिल्ली का रूप देने का नजरिया रखने वाली शीला दीक्षित अपने में एक मिसाल है. 81 वर्षीय शीला दीक्षित ने 15 सालों (1998-2013) तक भारत की राजधानी, दिल्ली की कमान संभाली. 20 जुलाई को शाम के 3:55 बजे उनका दिल के दौरे से निधन हो गया जिसका शोक पूरे भारत को है.

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राजनीति से पहचान

शीला दीक्षित की पहचान राजनीति से उनके ससुर, उमाशंकर दीक्षित, के समर्थन के दौरान हुई. नेहरू सरकार में उमा शंकर जी ने जब यूनियन मिनिस्टर का पद संभाला, तब शीला जी ने राजनीति को समझना शुरू कर दिया था. उनकी सहभागिता और कौशल देख इंदिरा गांधी ने उन्हें यूनाइटेड नेशंस कमिशन ऑन द स्टेटस ऑफ वूमेन (UNCSW) में भारत का प्रतिनिधि चुना.

दिल्ली से नई दिल्ली का सफर

लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी शीला दीक्षित ने दिल्ली को ‘अंतरराष्ट्रीय महत्ता’ का नया रूप दिया. दिल्ली की ना होते हुए भी वह गोल मार्केट कांस्टीट्यूएंसी, 1998 से इलेक्शन जीती और बाद में यूनियन टेरिटरी की मुख्यमंत्री भी बनी. कांग्रेस के सत्ता मैं होने के कारण, शीला जी ने दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने में अपनी योग्यता निभाई. उनकी मुहिम ” क्लीन दिल्ली ग्रीन दिल्ली” के दौरान से हम सभी वाकिफ है. उन्हीं की कोशिशों का नतीजे से दिल्ली में आज बनते फ्लाईओवर, डीटीसी बसें और दिल्ली का दिल- मेट्रो का निर्माण हो पाया है.

महिला सुरक्षा की साधक

महिलाओं का विकास हमेशा से ही शीला जी के काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा. यंग विमेन एसोसिएशन की अध्यक्ष के पद पर बैठी शीला जी ने दिल्ली में दो कामयाब कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल बनवाएं. भारत का यूएन कमिशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन (UNCSW) में प्रतिनिधित्व करा. महिला हिंसा के खिलाफ आवाज उठाती शीला जी 23 दिनों तक जेल में रही, किंतु मुद्दे पर अड़ी रही.

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने हाल ही में दीक्षित के साथ अपने एक साक्षात्कार का एक किस्सा साझा किया और ट्विटर पर लिखा, “हालिया दिल्ली चुनावों के दौरान, मैंने शीला दीक्षित से पूछा कि वह ८१ की उम्र में चुनावों में कैसे मुकाबला कर रही थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा: अभी तो मैं जवान हूँ”

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