मिलिए लद्दाख की पहली महिला ट्रेकिंग गाइड, तिनलास चोरोल से

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जब हमनें तिनलास चोरोल से पूछा के उन्हे पहाड़ों में ऐसा क्या पसंद है, तो उन्होने कहा:

“ना केवल पहाड़ों का सुकून, मुझे यहाँ की वाणी जीवन भी बहुत आनंद देता है”

लद्दाख की लुभावनी वादियों में ट्रेक करवाने माली वे पहली महिला हैं| इसकी शुरुआत उनके जीवन में तब हुई जब उनको अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कुच्छ पैसों की आवश्यकता थी, पर उन्हे यह काम इतना पसंद आया, के उन्होने फिर कभी पलट क नहीं देखा| आज ‘लड़ाखी वोमेन्स ट्रॅवेल कंपनी’ नाम से उनकी खुद की एक ट्रॅवेल कंपनी है, जिसकी शुरुआत उन्होने 6 वर्ष पहले करी थी ताकि और महिलाएँ यात्राओं का हिस्सा बन सके||

वे लद्दाखी महिला ट्रॅवेल कंपनी की निर्माता हैं, जो अपने तरह की पहली है!

हमनें उनसे यह भी पूछा के उन्हे ऐसा क्यों लगा कि महिलाओं के लिए एक ख़ास कंपनी की शुरुआत करना अच्छा आइडिया रहेगा, जिसपर उन्होने कहा:

जब मैने गाइड के रूप में शुरुआत की, मैं अनेक ट्रॅवेल कंपनीज़ के लिए काम करती थी| अपने ट्रेक्स के दौरान मैं कई लद्दाखी महिलाओं से मिली जो मेरे साथ चलके मेरा काम सीखने में रूचि दिखाती| कई महिला यात्रियों को भी एक महिला गाइड का साथ होना पसंद आता| यह सब देख कर मैं इस नतीजे पर पहुँची के मुझे इन दोनो समूहों को एक साथ लाकर खुश कर देना चाहिए||

जब तिनलास ने इसकी शुरुआत की, ट्रेकिंग महिलाओं के लिए एक आकर्षक नौकरी नहीं मानी जाती थी| हालाकी तिनलास ने इन सब बातों का खुद पर असर नहीं होने दिया| जब उन्हे एक महिला होने के कारण किसी ट्रॅवेल कंपनी ने नौकरी नहीं दी, उन्होने ‘अराउंड लद्दाख वित स्टूडेंट्स’ नमक संस्था के साथ काम शुरू किया, जहाँ पहले से कई महिलायें नौकरी कर रही थी| हालाकी यहाँ भी उन्होने अनुभव किया के महिलाओं को केवल मत और सांस्कृतिक पर्यटन तक सीमित रखा जाता था. वे जानती थी के वे इससे कठोर थी| वे अधिक कड़ी और असली ट्रेकिंग करना चाहती थी||

उनके जीवन का यहाँ तक का सफ़र आसान नहीं था, उन्हे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और हर कठिनाई के साथ, वे कुच्छ ना कुच्छ सीखती थी| एक समय के बाद उन्हे माहौल में स्वीकृति का अनुभव भी होने लगा| लोगों को उनसे इतनी समस्या नहीं थी की कोई उन्हे आके कुच्छ कहता||

कुच्छ महिलाओं के साथ हुए बुरे अनुभव के कारण, कई महिलायें पुरुष गाइड के साथ आरामदेह महसूस नहीं करती| जब वे हमारे साथ ट्रेक करती हैं, उन्हे पता होता है की उन्हे महिला गाइड प्रदान की जाएगी, क्योंकि हम केवल महिला गाइड के साथ ही काम करते हैं||

वे जम्मू कश्मीोर राज्य की पहली ग्रामीण उद्ययमी भी हैं, जिसके चलते उन्हे इंडियन मर्चेंट चेंबर के लॅडीस विंग का जन्किदेवि बजाज पुरस्कार से भी सम्मानित किया जाएगा| 2015 में वेल्लोरे इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नालजी ने ‘थे वीकेंड लीडर’ के साथ मिल कर ‘पर्सन ऑफ थे यियर’ की उपाधि से सम्मानित किया||

पर्यटन क्षेत्र में लिंग पक्षपात पर उनका कहना है:

ट्रेकिंग के क्षेत्र में हम बराबरी के आस-पास कही नहीं हैं| पर्यटन कुच्छ अलग है क्योंकि यहाँ पुरुषों से ज़्यादा महिलायें कार्यरत हैं| मुझे सतीिक आँकड़ा नहीं मालूम, परंतु मेरे हिसाब से लगभग इस क्षेत्र में 30 महिलायें होंगी| हज़ारों में नहीं, पुरुष गाइड कम से कम कई सैंकड़ों में होंगे; हमें अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है||

अपने इंटरव्यू की समापन पंक्तियों में वे कहती हैं:

समाज द्वारा तय किए गये मापदंडो से ज़्यादा अपने आप की सुने| ईमानदारी और लगान से महनत करने से आपने कामयाब होने की संभावना बढ़ जाती है

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