जब हम एक व्यक्ति को जानने की कोशिश करते हैं तो उसकी सफलता को देखते हैं और यह जानने की कभी कोई कोशिश नहीं करते हैं कि वो इंसान जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करता है। आयुषी सोनी की कहानी एक ऐसी कहानी है।

उनके पिता उनके लिए अपनी जॉइंट फॅमिली  के खिलाफ खड़े हुए , जिन्होंने क्रिकेट में अपनी बेटी का करियर बनाने में उसका साथ दिया ।  फीमेल क्रिकेट ने आयुषी सोनी से एक क्रिकेटर के रूप में छह महीने में 20 किलो वजन कम करने से लेकर, दिल्ली में क्रिकेट और इंडिया बी के कप्तान होने के बारे में बात करी. जानिए उनकी जर्नी के बारें में कुछ बातें

क्रिकेट में रुचि

अपने पिता से इंस्पायर होकर आयुषी सोनी ने 12 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया । अपने घर में शुरुआत से ही क्रिकेट के लिए बढ़ते हुए प्यार को देखकर उन्होंने बचपन से ही क्रिकेट में जाने के बारे में सोच लिया था । उनके घर में उनके पिता और भाई पहले से ही क्रिकेट खेलते थे ।आयुषी को क्रिकेट के आलावा कभी किसी और गेम में इंटरेस्ट नहीं रहा है ।दुनिया उनके पिता को कहती थी की यह एक लड़की है , इसे क्रिकेट मत खेलने दो । उनके पिता ने दुनिया की बिलकुल नहीं सुनी और उनके सपने को पूरा करने में उनका साथ दिया ।

इंडिया बी में ट्रॉफी जीतने का अनुभव

दो साल पहले आयुषी का पहला मैच टी 20 गेम्स में था और उसी मैच में दिल्ली ने टी 20 गेम्स जीती थी । अपने पहले मैच में आयुषी ने आखरी बॉल पर छक्का मारा था जिसकी वजह से उनकी टीम मैच जीत गयी थी । अपने पहले ही मैच में आयुषी का विनिंग छक्का उन्हें जीवनभर याद रहेगा क्योंकि यह उनके जीवन का ऐतिहासिक पल था ।

अकादमी के बाद डोमेस्टिक क्रिकेट में जाना

सुनीता मैम उनकी फॅमिली मेंबर की तरह हैं उन्होंने ने ही उन्हें दिल्ली टीम में इंट्रोड्यूस करवाया था । इससे पहले मुझे पता भी नहीं था की वीमेनज़ क्रिकेट क्या होता है ।मैंने अपना अंडर -19 सिलेक्शन दिया और उसी साल मई अंडर -19 टीम का हिस्सा बनी । फिर भी मुझे खेलने का मौका नहीं मिला । मै बस टीम का हिस्सा थी । डीडीसीए ने मुझे बहुत सपोर्ट किया है अंडर -19 क्रिकेट में बैटिंग ऑर्डर में आगे जाने से लेकर अंडर -23 टीम की कप्तान बनने तक, मुझे हर चीज़ में उनका सपोर्ट मिला है ।

डीडीसीए में सपोर्टिंग लोग

रीमा मल्होत्रा बहुत हेल्पफुल रही हैं। हम क्रिकेट के बारे में बहुत सारी बातें करते हैं और अगर मुझे खेल से पहले या सामान्य तौर पर किसी टिप्स या गाइडेंस की जरूरत है, तो वह बताती थी कि क्या किया जा सकता है। यहां तक ​​कि अंजुम चोपड़ा ने भी मेरा बहुत साथ दिया है ।

क्रिकेट और लाइफ का बैलेंस

10 वीं कक्षा तक, मैंने हफ्ते में 3 दिन स्कूल जाने और बाकी 3 दिन प्रैक्टिस के लिए यह व्यवस्था की। 10 वीं के बाद, हमने स्कूल से बात की और फिर मुझे जाना नहीं पड़ा। जब भी मुझे छुट्टी लेनी पड़ी, मुझे बस एक एप्लीकेशन जमा करना था, ताकि यह आसान हो जाए।

परिवार का रिएक्शन

मै एक जॉइंट फॅमिली में बड़ी हुई हूँ। हर कोई बहुत हेल्पफुल नहीं था। वे मेरे पिताजी से कहते थे “वह एक लड़की है, तुम उसे क्यों खेलने दे रहे हो? आगे कोई कैरियर नहीं है ”। मेरे पिता मेरे लिए खड़े हो गए, भले ही उनकी सोच उनसे अलग हो। मेरे पिता क्रिकेट में अपना करियर बनाना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने मुझमें वह टैलेंट देखा और इसलिए मेरा साथ दिया। जब मै डिप्रेस्ड होती हूँ तो वह मेरा सपोर्ट है यहां तक ​​कि जब हर कोई मेरी बुराई करता है तो, तो वह कहते है की कोई बात नहीं और वो मुझे सपोर्ट करते है। मेरी फॅमिली से सभी बहुत सुप्पोर्टिव रहे हैं।

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