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दस प्रेरणादायक कश्मीरी महिलायें जिन्होंने हार न मानने का निर्णय लिया

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STP Hindi Editor

जम्मू-कश्मीर राज्य ने हमें हजारों मेहनती महिलायेंदी है जिन्होंने सफलता हासिल की है. उनकी कहानियां इसलिये भी ख़ास हो जाती है क्योंकि उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान बाधाओं का सामना किया और फिर सफलता हासिल की. उनके दृढ़ संकल्प ने उन्हें आगे बढ़ाया और दूसरों को भी आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया.

दस प्रेरणादायक कश्मीरी महिलाओं के बारे में जानने के लिए पढ़ें जो अपने क्षेत्र में अग्रणी बन गई हैं.

मेहविश ज़र्गर

श्रीनगर में ज़र्गर ने मी ‘एन’ यू कैफे शुरु किया उसके साथ ही वह कश्मीर की पहली महिला कैफे उद्यमी बन गई. SheThePeople.TV के साथ एक साक्षात्कार में, उन्होंने बताया कि उन्होंने कानून की पढ़ाई की लेकिन कभी भी प्रेक्टिस नही की क्योंकि वह हमेशा उद्यमी बनना चाहती थी. खाने को लेकर उनका बहुत प्यार था जिसकी वजह से उन्होंने रेस्तरां खोलने के बारे में सोचा. बचपन में उन्हें काफी मुश्किलों के सामना करना पड़ा. जब वह केवल छः वर्ष की थी तभी उन्होंने पिता को कैंसर की वजह से खो दिया. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे लोगों ने उन्हें यह कहना शुरू कर दिया कि वह एक लड़की है और वह व्यवसाय चलाने के लिए उपयुक्त नहीं है. हालांकि, ज़र्गर ने उन पर ध्यान नहीं दिया और अपने लक्ष्य पर अपना  ध्यान केंद्रित किया.

“इतनी सारी लड़कियां हैं जिनके पास ऐसे बड़े सपने हैं और उनके पास उन्हें पूरा करने की क्षमता भी है. इसलिए, यदि मैं अपना सपना पूरा करती हूं और उन्हें दिखाती हूं कि यह एक संभावना है तो यह उनके सपनों को ओर एक कदम आगे बढ़ाने के लिए एक विश्वास स्थापित करेगा. “- ज़र्गर

नादिया निगहत

नादिया कश्मीर की पहली महिला फुटबॉल कोच है. फुटबॉल की इस कोच का जन्म श्रीनगर शहर से दो किलोमीटर दूर एक इलाके रामबाग के एक मध्यम वर्ग के मुस्लिम परिवार में हुआ था. उन्होंने बताया कि कैसे उनके इलाके में लड़कियों को खेलों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. इसलिए उन्होंने लड़को के साथ फुटबॉल खेलना शुरू किया. उन्होंने SheThePeople.TV को बताया कि जिस बाधाओं का सामना करना पड़ा वह उनके लिंग की वजह से नही था, बल्कि निरक्षरता की वजह से था. उनके पास 10 राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार हैं. वह वर्तमान में रामबाग में एक फुटबॉल अकादमी चलाती है और तीन लड़कियों सहित 30 से अधिक बच्चों को प्रशिक्षित करती है.

3. इकरा रसूल

कश्मीर में बारामुल्ला की रसूल एक युवा क्रिकेटर हैं जो महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा बनने के सपने देख रही है. वह झुलन गोस्वामी से प्रेरित है और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर काम करने के मंत्र में विश्वास करती है. उन्हें अपनी किशोरवस्था में क्रिकेट की ओर झुकाव होने की वजह से बहुत ज्यादा आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था.

“लोगों ने हमेशा मुझे बोला कि यह महिलाओं द्वारा खेला जाने वाला खेल नहीं है.  यह पुरुषों का खेल है. और मैं इसे खेल रही हूं यह ‘गंदी बात’ है, लेकिन मैंने हमेशा यह कहकर विरोध किया, ‘बाहर की लड़किया भी तो खेलती है, इतनी अच्छा करती है तो ये बुरी बात कैसे हुई.’  मैं खेलना चाहती थी और सुनिश्चित करना चाहती थी कि मैं उन्हें गलत साबित करूं. यही वह क्षण था जब मैंने फैसला किया कि मैं वास्तव में इसके लिए जाना चाहती हूं. सबसे अच्छी बात यह है कि मेरे कारण, कई अन्य लड़कियां जिनके परिवारों ने उन्हें खेलने की अनुमति नहीं दी, उन्हें खेलने का मौका मिला.”

4. सबाह हाजी

हाजी हाजी पब्लिक स्कूल की डायरेक्टर है जो जम्मू- कश्मीर के छोटे से गांव ब्रेसवाना में है. हाजी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का प्रयास कर रही है. इस बारे में बात करते हुए कि उन्हें इसके लिये किसने प्रेरित किया ताकि वह हर साल इतने सारे छात्रों के जीवन में सुधार कर सकें, वह कहती है, “मुझे प्रेरित बच्चों ने किया- मैं उनमें से कुछ को जन्म के समय से जानती हूं. मैंने सभी कक्षाओं में अधिकांश विषयों को पढ़ाया है, इसलिए मैं उनके सभी प्रश्नो और अभिव्यक्तियों को सही तरह से जानती हूं.”

सबाह के अनुसार, इस क्षेत्र में एक ठोस और निरंतर प्रभाव रखने के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करना आवश्यक है. स्कूल चलाने में सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हुए, वह कहती है कि सबसे बड़ी चुनौती अच्छे शिक्षकों को ढूंढना है.

5. नुसरत जहां

जहां ने अलग रास्ते पर चलने की हिम्मत की. दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के दादूरा गांव में पैदा हुई, इस महिला ने जम्मू विकास प्राधिकरण की अपनी नौकरी 2000 में छोड़ दी जिसमें वह कम्युनिटी आयोजक के तौर पर काम किया करती थी. उन्होंने अपना खुद का कट-फलावर का व्यवसाय शुरू किया. उन्होंने अपने परिश्रम और दृढ़ता की वजह से इसे एक सफल व्यवसाय में बदल दिया है जिसका अब दो करोड़ रुपए का वार्षिक कारोबार हो गया है. उनकी यात्रा बिल्कुल आसान नहीं थी. उनके पास उनके उत्पाद के लिए बाजार नहीं था.  इसके अलावा, उनके रिश्तेदारों ने भी उन्हें वैसी मदद नही की जिसकी वह उम्मीद करती थी.

उन्होंने स्थानीय अख़बार को बताया, “कश्मीर जैसे स्थान पर आपको कई चीजों को देखना होता है. जब पुरुष व्यवसाय करने के लिए बाहर जाते हैं तो यह एक आम बात के रूप में देखा जाता है. पार्लर या बुटीक के अलावा यदि कोई महिला बाहर जाती है और अलग व्यवसाय शुरू करती है और विशेष रूप से व्यवसाय जैसे कि फूलों की, खेती या कृषि व्यवसाय जिसमें पुरुष ज्यादा होते तो यह एक मुश्किल बात है.”

डॉ शर्मिन मुश्ताक

यह मेडिकल प्रोफेशनल पहली कश्मीरी महिला बन गई जब इन्होंने गुलमर्ग में स्नो कार रैली में भाग लिया. न्यूज़ 18 को दिये एक साक्षात्कार में दो बच्चों की मां ने कहा, “यदि मैं चाहती हूं, तो इस खेल में शामिल होने के लिए कश्मीर की और अधिक महिलाओं को प्रेरित कर सकती हूं, जिस से बाधाएं टूट जाएंगी.  कश्मीरी महिलाओं को अपने सपनों को जीने के लिए सीमाओं की जो बाधायें है उन्हें तोड़ना चाहिये. ”

इरतिका अयूब

23 साल की उम्र में कश्मीर की इरतिका, सीनियर रग्बी प्लेयर और रग्बी डेवलपमेंट आधिकारी है. उनकी यात्रा में कई तरह की कठिनाई आयी. उन्होंने SheThePeople.TV को बताया,”मुझे उसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा जैसे कि कोई भी कश्मीरी लड़की को अलग तरह का काम करने पर करना पड़ता है. मेरे माता-पिता पहले मुझे सहयोग करने के लिये तैयार नही थे लेकिन मुझे मिले कुछ पदकों ने उनकी राय बदल दी. वर्तमान में, मेरे माता-पिता मेरी इच्छा का समर्थन करते हैं.”

इरतिका ने राज्य स्तर पर सात स्वर्ण पदक जीते हैं और सात जिला स्तर पर जीते हैं. उन्होंने 2016 और 2017 में रग्बी 7 में रजत पदक जीता और 2017 में स्नो रग्बी में स्वर्ण पदक जीता.

रूही नाज़की

pic credits : Kashmir Life

नाज़की श्रीनगर की प्रसिद्ध चाय जाई की संस्थापक हैं. श्रीनगर में नदी के किनारे उनका कैफे युवा लड़कियों में काफी लोकप्रिय है, जो कहते हैं कि चाई जाई एक ऐसी जगह है जहां वे आख़िर में आकर सांस ले सकते हैं. उनका मुख्य मिशन चाय के इस कैफे को समावेशी बनाना है ताकि लोग वहां आकर अपना वक़्त गुज़ार सकें. वह मानती है कि यह सिर्फ एक चाय रुम नहीं है. वह इसे एक ऐसी जगह बनाना चाहती है जहां लोग आकर सांस्कृतिक बातचीत कर सकें. कैफे भी हर त्यौहार को बड़े पैमाने पर मनाने के लिए जाना जाता है.  वह मानती है कि कश्मीर में राजनीतिक स्थिति उसके व्यापार के लिए सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन उस बात ने उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोका.

ताजमूल असलम

2016 में, इस कश्मीरी लड़की ने इटली में विश्व किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत के लिए अंडर -8 में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास बनाया. युवा ताजमूल ने विश्व चैंपियन बनने के लिए अमेरिका से अपने प्रतिद्वंद्वी को मुक़ाबले से बाहर कर दिया. वह पहली कश्मीरी लड़की है जिसने इस तरह की उपलब्धि हासिल की. वह वुशु और तायक्वोंडो में भी महारत रखती है. असलम 2014 में किकबॉक्सिंग में आई जब वह एक स्थानीय अकादमी में शामिल हो गई, जहां पर  मार्शल आर्ट्स में युवा लड़कों और लड़कियों को प्रशिक्षित किया जाता था. वह अपने गृह राज्य के लिए आशा और दृढ़ संकल्प का एक सच्ची प्रतीक है. उनके पिता, गुलाम मोहम्मद लोन, एक निर्माण कंपनी में ड्रायवर के तौर पर काम करते है, के लिए एक चालक हैं.  लेकिन उन्होंने वित्तीय चुनौतियों को अपने बच्चों के शौक के आगे नही आने दिया.

इंशा मुश्ताक

इंशा 14 वर्ष की थी जब बंदूक की गोली की चोट से वह अंधी हो गई थी. 2016 की गर्मियों में विरोध प्रदर्शन के दौरान, कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों ने हिजब-उल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी को गोली मार दी थी. उस दौरान अपनी खिड़की से विरोध प्रदर्शन को देखते हुए उनकी दोनों आंखें पैलेटस की वजह से चली गई. हालांकि उनके छह आप्रेशन हुये लेकिन उनकी रोशनी वापस नहीं आ सकी. उनके लिये अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करना बेहद मुश्किल हो गया. हालांकि, वह जनवरी में अपनी कक्षा 10 की परीक्षा को पास करने में कामयाब रही. वर्तमान में, वह आगे पढ़ रही है और डॉक्टर बनने की इच्छा रखती है.

इतनी साहसी और आत्मविश्वास से भरी महिलाओं को पूर्ण और स्वतंत्र जीवन जीने का प्रयास करते हुये देखना खुशी देता है.

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