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सती सावित्री एक मिथक है : देवदत्त पट्टनायक

Published by
Aastha Sethi

अहमदाबाद में विमन राइटर्स फेस्ट के एक पैनल में, देवदत्त पट्टनायक ने दर्शकों से पूछा कि हम सती और सावित्री जैसी पौराणिक महिला पात्रों की कहानियाँ क्यों नहीं बता रहे हैं? उन्होंने बताया कि कैसे सती सावित्री से हमने एक बेचारी महिला की छवि को जोड़ दिया है. जब आप उनकी कहानियों को पढ़ते हैं, तो वे सीधी, घरेलू गृहिणियों के रूप में सामने नहीं आती हैं. लोकप्रिय मैथोलॉजिस्ट ने सती और सावित्री दोनों की दास्तान सुनाई. कैसे सावित्री ने यम से अपने पति का जीवन वापस ले लिया, यह भी बताया.

यदि आप इस दृष्टिकोण से देखें तो सती और सावित्री शांत और बोल्ड हैं. लेकिन फिर सती सावित्री ’शब्द का अर्थ पवित्र और घरेलू महिलाओं के साथ क्यों है? पट्टानिक कहते हैं, “आप खुद से पूछिए कि कोई भी आपको ये कहानियाँ क्यों नहीं सुनाता? क्यों कहानीकार केवल आपको सीता और क्रोधित द्रौपदी के रोने के बारे में बताना चाहते हैं, और शांत सती सावित्री के बारे में नहीं?”

हमें अपनी कहानियों की व्याख्या को फिर से देखने की जरूरत है. क्या सीता संकट में सिर्फ एक अबला महिला थी? क्या अपमान का बदला लेने के अलावा द्रौपदी के पास और कुछ नहीं था? इसके अलावा, क्या सीता और द्रौपदी ही एकमात्र महिलाएं है जिनकी कहानियां सुननी चाहिए? सती और सावित्री की कहानी भी आवश्यक है.

अगर नैरेटिव बदल जाए

भारतीय पौराणिक कथाएं उन महिलाओं की कहानियों से भरी हैं, जिन्हे अपने सम्मान के खातिर पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है.

पौराणिक कथाओं की लोकप्रिय कहानियां, हमें बताती हैं कि पुरषों द्वारा महिलाओं के सम्मान की रक्षा के बारें में बताती है. उन्हें बुराई और अन्य पुरुषों से बचाते हैं. बहुत कम कहानियाँ है जो महिलाओं की साहसी और मजबूत इच्छाशक्ति के बारे में होती है. महिलाओं को केवल पवित्र, सम्मानित और समर्पित पत्नियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

हमें अपनी कहानियों की व्याख्या को फिर से देखने की जरूरत है. क्या सीता संकट में सिर्फ एक अबला महिला थी? क्या अपमान का बदला लेने के अलावा द्रौपदी के पास और कुछ नहीं था? इसके अलावा, क्या सीता और द्रौपदी ही एकमात्र महिलाएं है जिनकी कहानियां सुननी चाहिए? सती और सावित्री की कहानी भी आवश्यक है.

हमारा समाज बेटियों को पितृसत्ता को चुनौती देने से रोकना चाहता है और अपने पसंद से बस शादी करवा देना चाहता है.

यदि लड़कियां पुरुषों को चुनौती देना शुरू कर, जो करना चाहती हैं, वो करे तो काफी कुछ बदलेगा. सती सावित्री शब्द से हम लंबे समय से एक महिला को असहाय, पारंपरिक और समर्पित के रूप में चित्रित करने के लिए उपयोग कर रहे हैं. कितनी आधुनिक महिलाएं वास्तव में ऐसी बनना चाहती हैं?

देवदत्त पट्टनायक

यह समय है कि हम नैरेटिव को बदलें और सती सावित्री शब्द से जुड़े अर्थ को बदले. जिन महिलाओं के साथ हम पहचान कर सकते हैं न कि जो समाज हमें बनाना चाहता हैं. तो आइए हम इन कथाओं को फिर से जानने के लिए एक नए सिरे से और सशक्त तरीके से पढ़ते है. और सक्षम महिलाओं को असहाय और दुखद दिखने से इनकार करते है.

(यह आर्टिकल यामिनी पुस्तके भालेराव ने अंग्रेजी में लिखा है.)

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