अरुणिमा सिन्हा एक ऐसी महिला है  जिन्होंने अपना एक पैर ना होने के बावजूद भी एवरेस्ट की ऊचाइयों पर चढ़ने में सफलता हासिल की।अरुणिमा ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर दुनिया को दिखा दिया कि अगर इंसान के अंदर कुछ करने का जज़्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। अरुणिमा उन सब लोगों के लिए मोटिवेशन है जो अपनी जिंदगी में कुछ करना तो चाहते हैं लेकिन प्रोब्लेम्स उनका रास्ता रोके रहती हैं, हर प्रॉब्लम का सोल्युशन ज़रूर होता है बस हमे उसको ढूंढ़ने की ज़रूरत होती है।

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अरुणिमा सिन्हा का जन्म और एजुकेशन

अरुणिमा सिन्हा का जन्म 20 जुलाई 1989 को अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होने अपने स्कूल की पढाई उत्तर प्रदेश से ही पूरी की थी उसके बाद अरुणिमा सिन्हा ने नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग उत्तरकाशी से माउंटेनियरिंग कोर्स किया , हालांकि इनको पढ़ाई लिखाई से ज़्यादा खेल कूद में इंट्रस्ट था इन्होंने नेशनल लेवल पर वॉलीबॉल भी खेला है और इसके साथ – साथ यह फुटबॉल खिलाड़ी भी रह चुकी है।

सिर्फ 3 साल की थी अरुणिमा जब उनके पिता ने इस दुनिया को छोड़ दिया

 अरुणिमा सिन्हा और उसका परिवार

अरुणिमा सिन्हा के पिता सेना में इंजीनियर हुआ करते थे लेकिन जब अरुणिमा सिर्फ 3 साल की थी तभी इनके पिता ने इस दुनिया को छोड़ दिया, इनकी मां भारत के हेल्थ डिपार्टमेंट में सुपरवाइजर हुआ करती थी। इनके आलावा अरुणिमा की एक बड़ी बहन और छोटा भाई भी है , पिता के जाने के बाद अरुणिमा के जीजा ने पूरे परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाई थी।

अरुणिमा सिन्हा का शुरुआती करियर

अरुणिमा सिन्हा बचपन से ही वॉलीबॉल एवं फुटबॉल खेलने में ध्यान दिया करती थी. अरुणिमा अपनी मेहनत के दम पर वॉलीबॉल में नेशनल खेल चुकी थी खेलते समय इन्होंने नौकरी करनी चाही और सीआईएसएफ की एक पोस्ट के लिए अप्लाई किया था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था एक दिन ट्रेन हादसे में इनके साथ हुई दुर्घटना ने उनके करियर को पूरी तरह से बदल कर रख दिया।

अरुणिमा सिन्हा ट्रेन एक्सीडेंट

सीआईएसएफ के एग्जाम में शामिल होने के लिए अरुणिमा को दिल्ली जाना था। 21 अप्रैल 2011 को अरुणिमा ने लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो ट्रेन में सफर के दौरान कुछ बदमाशों ने इनसे सोने की चेन और बैग चुराने की कोशिश की , जब अरुणिमा ने इन बदमाशों का विरोध किया तो बदमाशों ने अरुणिमा को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया। जबतक वो खुदको संभाल पाती तबतक ट्रेन उनके पैर को कुचल के जा चुकी थी। उसके बाद गांव के लोगों ने अरुणिमा को अस्पताल में एडमिट कराया ,जहां डॉक्टर ने इनकी जान बचाने के लिए इनके एक पैर को काट दिया जिससे अरुणिमा की जिंदगी तो बच गई लेकिन इन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। अरुणिमा सिन्हा से किस्मत ने भारत के लिए वॉलीबॉल खेलने का मौका छीन लिया था। एक स्पोर्ट्समैन प्लेयर होने के नाते अरुणिमा की ज़िन्दगी में ये बहुत बड़ा झटका था।

दुर्घटना के बाद अरुणिमा सिन्हा की जिंदगी का सफर

इस घटना के बाद भारत के खेल मंत्रालय ने अरुणिमा को 25 हज़ार रूपए देने की घोषणा और इसके साथ ही ISF की नौकरी देने के लिए इनकी सिफारिश की गई। खेल राज्यमंत्री द्वारा भी अरुणिमा को बेहतर इलाज के लिए दो लाख रूपए दिए गए इसके अलावा भारतीय रेल विभाग ने अरुणिमा को रेलवे में नौकरी करने का ऑफर दिया। 18 अप्रैल 2011 को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस द्वारा अरुणिमा को एक नकली पैर लगाया गया , इस मेडिकल कॉलेज में इनको 4 महीने तक भर्ती किया गया था।

पुलिस ने लगाया था अरुणिमा पर आत्महत्या का आरोप

पुलिस ने अरुणिमा पर आत्महत्या करने के लिए ट्रेन की पटरी गलत तरीके से पार करने के आरोप लगाए थे। जब इस केस पर कोर्ट का फैसला आया तो फैसले में पुलिस को गलत ठहराया गया और कोर्ट ने आदेश दिया कि भारतीय रेलवे अरुणिमा को 5 लाख की राशि मुआवजे के रूप में देगी।

अरुणिमा सिन्हा अपनी मेहनत की बदौलत 2012 में CISF की हेड कांस्टेबल के लिए होने वाले एग्जाम में पास हुई

अरुणिमा सिन्हा को कहां से मिली इंस्पिरेशन

जब अरुणिमा अस्पताल में थी तो उन्होंने कुछ नया कर दिखाने का फैसला लिया और वह फैसला था , ऊंचे – ऊंचे पर्वतों पर अपने देश का झंडा लहराना। अरुणिमा को मोटीवेट करने का काम उस टाइम चल रहे एक टीवी शो ‘टू डू समथिंग’ ने किया था। इनको दूसरी सबसे बड़ी इंस्पिरेशन इंडियन क्रिकेटर युवराज सिंह से मिली थी ,जिन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को हराकर फिर से अपने देश के लिए खेलने का जज्बा दिखाया था।अरुणिमा सिन्हा जब अस्पताल से इलाज कराने के बाद निकली तो इन्होंने भारत की पहली बार माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने वाली महिला बछेंद्री पाल से मिलने का सोचा। इसके बाद अरुणिमा सिन्हा पर माउंट एवरेस्ट पे अपने देश का झंडा फहराने का जुनून सवार हो गया।

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली विकलांग महिला बनी अरुणिमा सिन्हा

 माउंट एवरेस्ट पर फतह करने के लिए अरुणिमा सिन्हा ने खुदको पूरी तरह से मोटीवेट कर रखा था। अरुणिमा ने 2012 में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन से माउंटेन पर चढ़ने की ट्रेनिंग ली। फिर साल 2012 में सिन्हा ने एवरेस्ट की चढ़ाई करने की तैयारी के लिए आईलैंड पीक पर चढ़ाई की जिसकी ऊंचाई 6150 मीटर थी। 2 साल तक कड़ी मेहनत और ट्रेनिंग लेने के बाद अरुणिमा ने दुनिया की सबसे ऊंची माउंटेन पर पहुंचने का मन बनाया। TSF की ट्रेनर सुजान महतो के साथ अरुणिमा सिन्हा ने 21 मई 2013 को सुबह 10:55 पर एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी की ,इनको एवरेस्ट समिट पूरा करने के लिए कुल 52 दिन लगे थे। उस समय अरुणिमा की उम्र सिर्फ 26 साल की थी। अरुणिमा भारत की पहली ऐसी विकलांग महिला बन गई ,जिन्होंने एवरेस्ट पर जीत हासिल की है। विकलांग होने के बाद भी अरुणिमा में इतना जज्बा था कि एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचना भी आसान हो गया. इस सफलता के दौरान इन्होंने एक कपड़े पर भगवान शंकर एवं विवेकानंद को धन्यवाद लिखकर बर्फ में दफन कर दिया था।

अरुणिमा ने अभी तक छह चोटियों पर चढ़ने का काम पूरा किया है,जिनमें से एशिया में एवरेस्ट ,अफ्रीका में किलिमंजारो, यूरोप में एल ब्रश, ऑस्ट्रेलिया में कोसीओअर्जेंटीना में एकांगुओ और इंडोनेशिया में कांस्टेंस पिरामिड आदि शामिल हैं।

 अरुण सिन्हा को मिले पुरस्कार

अरुणिमा को भारत सरकार की तरफ से 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया जो कि भारत का चौथा बड़ा सम्मान है। इनको 2016 में Tenzing Norgay National Adventure Award दिया गया। 2016 में First Lady Award से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी इन्हें Malala Award ,Yash Bharti Award , Rani Laxmi Bai Award जैसे अवार्ड से  कई बार सम्मानित किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश सरकार ने अरुणिमा के विकलांग होते हुए भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के जज़्बे को सलाम किया और इनाम के तौर पर 25 लाख रूपए इनाम में दिए।

अरुणिमा सिन्हा की किताब

अपनी जिंदगी की प्रॉब्लम्स और लाइफ स्ट्रगल को अरुणिमा ने एक किताब के जरिए एक्सप्रेस किया। जिसका नाम ‘बॉर्न अगेन ऑन द माउंटेन’ है। इस किताब को दिसंबर 2014 में हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथों से लांच कराया गया था। अरुणिमा का कहना है कि “इस किताब में मैंने अपने अनुभव लिखे हैं जो बहुत लोगों को मोटिवेट कर सकते हैं , हम तब तक कमजोर नहीं हैं जब तक हम खुद हार नहीं मान लेते। हर इंसान कुछ भी कर सकता है चाहे वह विकलांग ही क्यों ना हो बस उसके अंदर आत्मविश्वास होना चाहिए इसी आत्मविश्वास को जगाने के लिए मैंने इस किताब को लिखा ,जिससे मैं अपनी सोच को हर उस इंसान तक पहुंचा सकूं जो अपने आपको किसी से कमजोर समझता है। ”

अरुणिमा सिन्हा , एक सोशल वर्कर

अरुणिमा इनाम में मिल रहे पैसों को सोशल वर्क में यूज़ करती है। इन्होने गरीब और विकलांग लोगो के लिए स्पोर्ट्स अकैडमी खोली है , जिसमे वो उनको ट्रेनिंग की फैसिलिटी प्रोवाइड कराती है। अरुणिमा सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पुरे सामाज के लिए काम करना चाहती है। अरुणिमा का कहना है “जिस दिन आपने सोच लिया कि आप यह कर सकते है ,तब पूरी दुनिया मिलकर भी आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।”अरुणिमा के इस ज़ज़्बे को बछेंद्री पाल ने भी सलाम किया था।

“कमजोरि या विकलांग होना हमारी सोच पर डिपेंड करता है ,अगर कोई दिमाग से विकलांग हो तो उसके शरीर के मजबूत होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन वही तुम दिमाग से मजबूत हो तो शरीर की विकलांगता तुम्हें लक्ष्य तक पहुंचने से रोक नहीं सकती

उनकी ज़िन्दगी में काफी प्रोब्लेम्स आई , बचपन में पिता छोड़ के चले गए , फिर ट्रेन हादसा और यहां तक की इस हादसे के बाद भी उन्ही पर आत्महत्या का आरोप लगा दिया गया। हमारे समाज में महिला को हर चीज़ का प्रूफ देना होता है। लेकिन हमे कभी हार नहीं माननी चाहिए , सच्चाई एक ना एक दिन सामने आ ही जाती है , जैसे अरुणिमा सिन्हा को इन्साफ मिला। अरुणिमा सिन्हा हर एक औरत के लिए इंस्पिरेशन हैं जो अपने लाइफ में आने वाली प्रोब्लेम्स की वजह से रुक जाती है , अपने एम को पूरा करने की उम्मीद छोड़ देती है। इसलिए हमे कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।अरुणिमा की इसी सोच और ज़ज़्बे की वजह से आज वो इस मुकाम पर है , हमे भी अरुणिमा की ज़िन्दगी से इंस्पिरेशन ले कर आगे बढ़ना चाहिए।

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