डॉक्टर मिशेल हैरिसन अपनी नौकरी छोड़कर अन्य सक्षम लड़कियों की देखभाल करने के लिए न्यू जर्सी से कोलकाता शिफ्ट हो गईं। यह उनकी कहानी है।

सकारात्मक महिलाओं कि कहानियां हमारे आसपास होती हैं। बहुत से लोग हमें दिखाते और सिखाते हैं कि साहस होना और दयालु बनने का मतलब क्या होता है। उदाहरण में ऐसी कई सशक्त महिलाएं हैं जिन्होंने बहुत सी ज़िंदगियों में बदलाव लाया है। ऐसी ही एक कहानी है डॉ मिशेल हैरिसन।

न्यू जर्सी में उनका जीवन पूरी तरह से सेट था। उनके कैरियर में सब कुछ था, जिसकी इच्छा इंसान रखता है। वो स्त्रीरोग विशेषज्ञ के साथ ही मनोचिकित्सक और जॉनसन एंड जॉनसन इंस्टीट्यूट फॉर चिल्ड्रेन में एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर भी थीं। इनके साथ साथ उन्होंने हार्वर्ड, रजर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग जैसे प्रमुख विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है।

लेकिन फिर उन्होंने एक ऐसा फैसला किया जो कई ज़िंदगियों पर असर करने वाला था। उन्होंने न्यू जर्सी छोड़कर कोलकाता आने का फैसला लिया ताकि वह बहुत सी विकलांग लड़कियों को मां जैसा प्यार दे सकें और उन्हें घर की छांव दे सकें।

यह सब की शुरुआत हुई जब वो अपने दूसरे बच्चे, सिसिलिया देवयानी हैरिसन को 1984 में गोद ले रही थीं। 2004 में वो अपनी बेटी को कोलकाता लेकर आयीं। हैरिसन ने कहा, “मैं उसे उसके बायोलॉजिकल माता-पिता से मिलवाना चाहती थी।”

वर्ष 2001 में वो इंटरनेशनल मिशन ऑफ होप गए, जहां सीसिलिया को गोद लिया गया था। उसकी एक मासी वहां मिलने आई थी। उस घटना को याद कर उन्होंने कहा, “हमें कहा गया कि वो सीसिलिया की असली मां थी। उन्होंने यहां तक कि एक जुड़वा बहन, बायोलॉजिकल पिता और दादी भी बना दिए, जो कि उस मासी के लिए काम कर रहे थे।”

बहुत से गोद लिए बच्चे अपने माता पिता के बारे में जानना चाहते हैं, इसलिए हमारे पास उन पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं था। लेकिन जब सिसीलिया ने गलती से कुछ ऐसा सुना जिसका कोई सही मतलब नहीं था, तब हैरिसन ने सोचा कि कुछ गड़बड़ है और सिसीलिया का डी. एन. ए. टेस्ट करवाया और उन्हें पता चला कि डीएनए उनसे मैच नहीं करता।

इसके अलावा हैरिसन को पता चला कि वो बच्चे जो अन्यथा सक्षम थे और वैसे ही आश्रमों में रह रहे थे, उन्हें बिस्तर पर बांध कर रखा जाता था। “उन बच्चों के साथ हुए छल, झूठ और उनकी भयानक स्थिति को देखकर उन्होंने बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी।”

कैंसर के जंग से सफलतापूर्वक जीतने के बाद उन्होंने अपना न्यू जर्सी का घर बेच दिया और कोलकाता आ गईं। उन्होंने ‘शिशुर् सेवाए’ बनाया। यह अन्यथा सक्षम लड़कियों के लिए आश्रम औरफैसिलिटेशन सेन्टर है। न्यू अलीपुर के शाहपुर में यह आश्रम है जो कि अन्यथा सक्षम लड़कियों के लिए घर है। कई तरह की अक्षमताओं से ग्रसित लड़कियां यहां रहती हैं जो ऑटिज्म, माइक्रोसेफली और सेलेब्रल पाल्सी जैसे बीमारियों से जूझ रही हैं।

2013 में उन्होंने ‘इच्छे दान’ नामक लर्निंग सेन्टर खोला जो शिशुर् सेवाए के सबसे ऊपर मंज़िल पर स्थित है। लड़कियां यहां पर हर रोज़ क्लासेज अटेंड करती हैं। तीन लड़कियां यहां से अगले साल नेशनल इस्टिट्यूट फॉर ओपेन स्कूलिंग के परीक्षाओं में भी जाएंगी।

इसके अलावा हैरिसन यहां पर स्वीडन में बने टोबी आई ट्रैकर भी लाने में कामयाब रहीं जिसकी मदद से अन्यथा सक्षम लड़कियां अपने विचार और ज़रूरतें बता पाती हैं केवल अपने आंखों को स्क्रीन पर इस्तेमाल करके। यह भारत में सबसे पहली दफा लाया गया है और इसका इस्तेमाल क्लास में एवं अनौपचारिक संवादों में किया जाता है। इसकी मदद से बड़ी लड़कियां छोटी बहनों से बातें भी करती हैं।

अपनी बेटियों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरी बेटियां मेरी ताकत हैं। दोनों मुझसे मिलने अक्सर आया करती हैं।” उनकी बेटी, हीदर वोलिक वकील हैं और सिसीलिया ड्रमर हैं।

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