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Photograph: (iStock)
हमारे समाज में शादी को अक्सर महिलाओं की ज़िंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य मान लिया जाता है। लेकिन आज जब कई महिलाएँ शादी को लेकर सवाल उठा रही हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि समस्या शादी से नहीं है। असली समस्या उस कॉम्प्रोमाइज़ से है, जिसकी उम्मीद ज़्यादातर सिर्फ़ लड़की से ही की जाती है। शादी एक रिश्ता है, लेकिन जब यह रिश्ता एकतरफ़ा समझौतों पर टिका हो, तो वही डर और असहजता पैदा करता है।
क्या समस्या शादी है, या वह कॉम्प्रोमाइज़ जो हमेशा लड़की से ही माँगा जाता है?
1. शादी के साथ बदल जाती हैं उम्मीदें
शादी से पहले लड़की की पढ़ाई, करियर और आज़ादी को सराहा जाता है, लेकिन शादी के बाद अचानक उससे “एडजस्ट” करने की उम्मीद की जाती है। घर, परिवार, रिश्तेदार और परंपराएँ—सब कुछ संभालने की ज़िम्मेदारी उसी पर डाल दी जाती है। यहीं से समस्या शुरू होती है, क्योंकि शादी के साथ उसकी पहचान पीछे छूटने लगती है।
2. कॉम्प्रोमाइज़ को फ़र्ज़ मान लेना
लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि उन्हें समझौता करना आना चाहिए। शादी के बाद यह समझौता उनकी आदत नहीं, बल्कि फ़र्ज़ बना दिया जाता है। अपनी पसंद, अपने सपने और अपनी आवाज़ को दबाना सामान्य मान लिया जाता है। जब कॉम्प्रोमाइज़ एकतरफ़ा हो जाए, तो वह रिश्ता बोझ बन जाता है।
3. बराबरी की जगह चुप्पी की उम्मीद
कई बार लड़की की चुप्पी को उसकी सहमति समझ लिया जाता है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह हर बात पर शांत रहे, टकराव न करे और रिश्ते को निभाने के लिए खुद को पीछे रखे। लेकिन बराबरी का रिश्ता वही होता है, जहाँ दोनों अपनी बात कह सकें। जब बोलना मुश्किल हो जाए, तो शादी डरावनी लगने लगती है।
4. करियर और पहचान पर सवाल
शादी के बाद अक्सर लड़की के करियर को सेकेंडरी मान लिया जाता है। उससे पूछा जाता है कि नौकरी ज़रूरी है या घर? यह सवाल शायद ही किसी लड़के से किया जाता है। यही असमानता महिलाओं को यह सोचने पर मजबूर करती है कि शादी उनके सपनों की कीमत पर तो नहीं होगी।
5. नई सोच, नए सवाल
आज की महिलाएँ शादी से भाग नहीं रहीं, बल्कि शर्तों पर सवाल उठा रही हैं। वे रिश्ता चाहती हैं, लेकिन खुद को खोकर नहीं। वे प्यार, सम्मान और बराबरी चाहती हैं—सिर्फ़ “एडजस्ट कर लो” वाली सलाह नहीं। यही वजह है कि अब शादी का डर नहीं, बल्कि एकतरफ़ा कॉम्प्रोमाइज़ का डर ज़्यादा बड़ा हो गया है। समस्या शादी नहीं है, समस्या वह सोच है जो आज भी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ लड़की के कंधों पर डाल देती है।
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