लता मंगेशकर भारत की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सबसे फ़ेमस सिंगर में से एक है। उन्होनें अपनी खुबसूरत आवाज़ का जादू भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चलाया है। उन्हें टाईम मैगजीन (Time Magazine) ने इंडियन प्लेबैक सिंगिंग की “Undisputable queen” describe किया था।

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वो वक़्त कौन भूल सकता है जब एक फंक्शन में लता जी ने “ए मेरे वतन के लोगो को,जरा आँख में भर लो पानी” गाया था तब पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के आँखों में भी आँसू आ गए थे। लता मंगेशकर जी को संगीत का synonym कहना भी गलत नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने अपनी सुरीली और मंत्रमुग्ध (mesmerize) कर देने वाली आवाज़ से संगीत में जो स्टैंडर्ड डीफाइन किया है, वहां तक शायद ही कोई पहुंच सकता है।आज के समय में भी लोग लता जी से उतना ही प्यार करते है जितना 70, 80 और 90 के दशक में करते थे।

कई सदियों की ‘महागायिका’ कही जाने वाली लता जी भारत की एक सबसे फ़ेमस, बेहतरीन और सम्मानित प्लेबैक सिंगर और म्यूजिक कंपोजर के रुप में जानी जाती हैं। भारत रत्न लता मंगेशकर जी कई दशक से भारतीय सिनेमा को अपनी मीठी आवाज दे रही हैं। आज लता मंगेशकर जी के आगे पूरी संगीत की दुनिया आभारी  है। उन्हें सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादासाहेब फाल्के अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। 

तो आइए जानते हैं लता मंगेशकर जी के जीवन, संगीत करियर और उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें।

लता जी का शुरुआती जीवन 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक बेहतरीन थियेटर सिंगर थे। दीनानाथ जी ने लता को तब से म्यूजिक सिखाना शुरू किया, जब वे पांच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा भोंसले, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। बचपन से ही म्यूजिक में इंटरेस्ट होने की वजह से लता मंगेशकर ने अपना पहला पाठ अपने पिता से सीखा था।

वे अपने पिता से अपने सभी भाई-बहनों के साथ क्लासिकल म्यूजिक सीखतीं थी। जब लता जी महज 5 साल की थी, तब से उन्होंने अपने पिता के म्यूजिकल प्ले के लिए एक्ट्रेस के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। लता मंगेशकर जी के टैलेंट का एहसास उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर को बचपन में ही हो गया था और उन्होंने लता जी के करियर को बहुत प्रोत्साहित किया था 

संगीत की शुरुआती पढ़ाई 

शुरु से ही संगीत में इंटरेस्ट होने की वजह से लता जी ने क्लासिकल म्यूजिक की ट्रेनिंग उस्ताद अमानत खान, बड़े गुलाम अली खान, पंडित तुलसीदास शर्मा और अमानत खान देवसल्ले से ली थी। लता मंगेशकर के टैलेंट को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। पाँच साल की छोटी सी उम्र में ही उन्हें पहली बार एक प्ले में एक्ट करने का मौका मिला। लता ‘अमान अली ख़ान साहिब’ और बाद में ‘अमानत ख़ान’ के साथ भी पढ़ीं।

शुरुआत उनकी थियेटर से हुई पर उनका इंटरेस्ट हमेशा से ही संगीत में था। उस समय लता जी के.एल. सहगल के म्यूजिक से काफी प्रभावित थी.

पिता की मौत के बाद घर को खुद संभाला

जब उनके पिता की दिल की बीमारी से मौत हो गई और वे अपने बड़े परिवार को बीच में छोड़ कर चले गए, उस वक़्त लता जी सिर्फ 13 साल की थी। मगर परिवार में सबसे बड़ी होने के कारण लता जी पर अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई। उसके बाद से लता जी ने काफी कम उम्र में ही अपने परिवार के लिये काम करना शुरू कर दिया था। उस वक़्त नवयुग चित्रपट फिल्‍म कंपनी के मालिक और इनके पिता के दोस्‍त मास्‍टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने इनके परिवार को संभाला और लता मंगेशकर को एक सिंगर और ऐक्ट्रेस बनाने में मदद भी की।

लता जी का संगीत में करियर

सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई म्यूज़िक डायरेक्टर ने तो  उन्हें शुरू-शुरू में पतली आवाज़ के कारण काम देने से साफ़ मना कर दिया था। उस समय की फ़ेमस प्लेबैक सिंगर नूरजहाँ के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपने टैलेंट की वजह से उन्हें काम मिलने लगा। लता जी की इस कामयाबी ने उनको फ़िल्मी दुनिया की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था। 

13 साल की उम्र में लता जी ने अपने करियर की शुरुआत मराठी गाने से की थी। लता ने अपना पहला गाना 1942 में मराठी फिल्म ‘किती हसाल’ के लिये “‘नाचू या ना गड़े खेडू सारी, मानी हौस भारी’ गाया था, इस गाने को सदाशिवराव नेवरेकर ने कंपोज किया था, लेकिन आने वाले सालों में उन्हें पहचान बनाने के लिये बहुत स्ट्रगल करना पड़ा। लता जी के टैलेंट को पहचान मिली 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गाना गाने का मौक़ा मिला। इस गाने के बाद तो उन्हें फिल्मी दुनिया में एक पहचान मिल गयी और एक के बाद एक कई गीत गाने का मौक़ा मिला। 

फिर 1948 में मजदूर फिल्म का गाना “दिल मेरा तोड़ा,मुझे कहीं का ना छोड़ा” से लता मंगेशकर को लोग बेहद पसंद करने लगे। इसके बाद 1949 में आई फिल्म ‘महल’ में उन्होंने अपना पहला सुपर हिट गाना “आएगा आने वाला” गाया। इस गाने के बाद लता जी, संगीत की दुनिया के कई बड़े म्यूजिक डायरेक्टर और प्लेबैक सिंगर की नजरों में आ गईं थी, जिसके बाद उन्हें एक के बाद एक कई गानों के लिए ऑफर मिलते चले गए।

1950 में लता जी को कई बड़े म्यूजिक डायरेक्टर जैसे अनिल बिस्वास, शंकर जयकिशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, सलिल चौधरी, मदन मोहन, कल्यानजी-आनंदजी के साथ काम करने का मौका मिला। उनके लाइफ का टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्हें 1958 में म्यूजिक डायरेक्टर सलिल चौधरी की फिल्म “मधुमती” का गाना “आजा रे परदेसी” के लिए बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का सबसे पहला फिल्मफेयर अवार्ड  मिला।

इसके अलावा लता जी ने बंगाली भाषा के गाने और बाद में कई अलग-अलग भाषाओं में गाने गाकर अपनी आवाज से संगीत को एक नई पहचान दी है। इस दौरान लता जी ने कई बड़े म्यूजिक कंपोजर जैसे हेमंत कुमार, महेन्द्र कपूर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे के साथ कई बड़े प्रोजक्ट्स किए थे। यह वो दौर था जब बड़े से बड़ा प्रोड्यूसर, म्यूजिक कंपोजर, एक्टर और डायरेक्टर लता जी के साथ काम करना चाहता था।

इस समय में उन्होंने “प्यार किया तो डरना क्या”, “अजीब दास्ताँ है ये” जैसे कई सुपरहिट गाने गाए। और तो और लता जी ने दो आंखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, जैसी एवरग्रीन फ़िल्मों में गाने गाए हैं। इसके बाद मंगेशकर की सफलता और आवाज़ का जादू 1970 और 1980 के दशक में भी चलता गया। इस दौर में उनके किशोर कुमार के साथ गाए ड्यूएट काफी पसंद किए गए जो कई सदियों तक हम गुनगुनाते रहेंगे।

 “कोरा कागज़” “तेरे बिना जिंदगी से” तेरे मेरे मिलन की” और “आप की आँखों में कुछ” वो गाने हैं, जिन्हें सुनकर आज भी मन को सुकून मिलता है और हम इन्हें गुनगुनाने से खुद को रोक नहीं पाते। ये लता जी के एवरग्रीन गाने हैं। उन्होंने कई म्यूज़िक एलबम भी लाँच किये और अपनी जिंदगी में आज तक 30,000 से भी ज्यादा गाने गाये हैं। 

‘लता मंगेशकर इन हर ओन वॉयस’

लता मंगेशकर पर लिखी गई किताब “लता मंगेश्कर इन हर ओन वॉयस” में उन्होनें एक वक़्त का ज़िक्र किया है कि किस तरह दिलीप कुमार ने लता के मराठी होने की वजह से उनकी उर्दू अच्छी न होने पर कमेंट किया था। जिसके बाद लता ने अपनी उर्दू भाषा को ठीक करने के लिए एक टीचर भी रखा, जो दिखाता है की वो संगीत के लिये कितनी डेडिकेटेड थीं।

इस किताब में उन्होनें खुद कहा है, “हर किसी की ज़िंदगी में ऐसा होता है कि सफलता से पहले आपको असफलता मिलती है। मैं विवेकानंद और संत ज्ञानेश्वर की भक्त हूँ। मैं तो बस लोगों से इतना कहना चाहुँगी कि कभी हार मत मानो। एक दिन आप जो चाहते है वो ज़रूर मिलेगा।”

बेमिसाल और हमेशा दिलों पर छाई रहने के बावजूद लता जी ने बेहतरीन गायन (singing) के लिए रियाज़ (practice) के नियम का हमेशा पालन किया, उनके साथ काम करने वाले हर म्यूज़िक डायरेक्टर ने कहा है कि वे गाने में चार चाँद लगाने के लिए हमेशा कड़ी मेहनत करती रहीं हैं।

लता मंगेशकर को दिए गए अवार्ड और सम्मान 

लता मंगेशकर जी को अपने करियर में बहुत से बड़े सम्मान और नेशनल अवार्ड्स दिए गए हैं, जिनमें भारत के सर्वोच्च(Highest) पुरस्कारों में पद्मश्री और भारत रत्न भी शामिल हैं। इसके अलावा लता जी को ‘गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स’ की तरफ से भी उनका सम्मान किया जा चुका है।मध्यप्रदेश सरकार की तरफ से उनके नाम पर हर साल 1 लाख रूपये का स्कॉलरशिप दिया जाता है।

1989 में लता जी को फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े ‘दादा साहब फाल्के अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। भारत रत्न लता मंगेशकर देश की सबसे ज्यादा चाही जाने वाली सिंगर है जिनका करियर कई मुश्किलों से भरा हुआ था मगर उन्होंने खुद को बनाया और आज वहाँ पहुंची जहाँ शायद ही कोई पहुँच पाएगा। 

उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आये,

कभी बॉर्डर पर खड़े जवानों को सहारा मिला, तो कितने ही लोगों को अपने प्यार को बयाँ करने की आवाज़ मिली।

लता जी ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और बहुत स्ट्रगल किया है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और लगातार आगे बढ़ती रहीं। आज लता जी सभी के लिए एक आइडियल हैं और उनका जीवन कई लोगों को इन्फ्लूएंस करता है। हम सबके लिये लता जी एक inspiration हैं और उन्हें देखकर हम कह सकते है की हमेशा आगे बढ़ना ही हमारी चॉइस होनी चाहिये.

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