जैसा कि हम सब जानते है कि पीरियड्स जब खत्म हो जाते है तो उस स्टेज को मेनोपॉज या हिंदी में रजोनिवृति के नाम से जाना जाता है। आमतौर पर किसी लड़की को 12-15 की उम्र में पीरियड्स होना शुरू होते हैं और ये करीबन 45-50 की उम्र तक चलते हैं। मेनोपॉज का मतलब होता है कि अब आपको कभी पीरियड्स नहीं होंगे और न ही अब आप कभी माँ बन पाएंगी। यह कोई बीमारी नहीं होती बल्कि आप कह सकते हैं की ये महिलाओं में एक तरह का बदलाव होता है, जो उनके शरीर पर प्रभाव डालता है। तो, आइए जानते है मेनोपॉज से जुड़े इन लक्षणों के बारें में जिससे महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान जूझने पड़ते हैं।

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भूलने की बीमारी

मेनोपॉज से महिलाओं को भूलने की बीमारी हो सकती है। कुछ महिलाओं में यह डिसऑर्डर शुरुआती समय से तो कुछ में बाद में देखने को मिलता है। हार्मोन के कम होने से छोटी-छोटी बातें भूलने की दिक्कत होती है। यह रूटीन लाइफ को प्रभावित करता है। कॉर्टिसोल एक हार्मोन है जो मेमोरी को बनाए रखने में बहुत हेल्पफूल होता है। कॉर्टिसोल दिमाग के केमिकल को संतुलित रखता है। इसमें उतार-चढ़ाव से असंतुलन होता है जिससे शार्ट टर्म मेमोरी लॉस भी हो सकता है।

थकान होना

शरीर में अचानक से होने वाले बदलाव के कारण आप पूरा दिन थका हुआ महसूस कर सकती हैं। मेनोपॉज के बाद शरीर की एनर्जी काफी कम हो जाती है। इसमें सभी हार्मोन के लेवल जैसे की प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजन और थाइरॉइड में तेजी से बदलाव आता है। शरीर के एनर्जी लेवल को नॉर्मल बनाए रखने में ये हार्मोन मदद करते हैं। थकान को दूर करने के लिए जीवनशैली में पॉज़िटीव बदलाव लाना जरुरी है। सभी चीजें समय-समय पर करनी चाहिए साथ ही साथ अपने आहार में न्यूट्रीयंट्स का खास ध्यान भी रखना चाहिए।

हॉट फ्लैश

मेनोपॉज के बाद हॉट फ्लैश की प्रॉब्लम्स हो सकती है। हॉट फ्लैश होने पर शरीर का टेम्परेचर अचानक से बढ़ और घट जाता है। यह किसी बाहरी कारण की वजह से नहीं होता बल्कि मेनोपॉजके बाद विकार के तौर पर होता है। हॉट फ्लैश की समस्या मेनोपॉज के बाद 10 साल तक रह सकती है। इससे गर्दन और माथे में पसीना आता है, तनाव और दिल की धड़कन बहुत तेज हो जाती है।

नींद की बीमारी होना

मेनोपॉज के वक्त शरीर की एनर्जी बहुत कम हो जाती है। इसके अलावा शरीर में एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन के लेवल में भी उतार-चढ़ाव होने लगता है। इन सभी समस्याओं के कारण हॉट फ्लैश और नींद की बीमारी देखने को मिलती है।

रजोनिवृत्ति के दौरान तीन तरह से नींद पर असर होता है:-

-मेनोपॉज मूड डिसऑर्डर

-स्लीप डिसऑर्डर ब्रीथिंग

-फाइब्रोमाइल्जी

मूड स्विंग होना

हार्मोन के बदलाव का असर दिमागी केमिकल्स को प्रभावित कर इनमें बदलाव, चिंता और डिप्रेशन का कारण बनते हैं। मेनोपॉज के बाद मूड स्विंग की समस्या होती है। सुख में भी अचानक से दुख महसूस होने लगता है। यह मेंटली कमजोर बनाता है। इसमें कारणों का पता नहीं होता है लेकिन इसके बावजूद तनाव और चिंता रहती हैं। इससे बचने के लिए पूरी नींद लेना जरूरी है। जब भी मूड स्विंग हो, लंबी-गहरी सांसे ले और ठंडा पानी पीयें।

स्किन से संबंधित प्रॉब्लम्स

मेनोपॉज के दौरान अक्सर त्वचा से संबंधित समस्याएं देखी जाती है। त्वचा में सूखापन, खुजली की समस्या और लाल चकत्ते बनने लगते हैं। रजोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल कम होने से इसका असर सीधा त्वचा पर पड़ता है। इससे त्वचा में ऑयल बनना बंद हो जाता है जिससे ड्राई स्किन की शिकायत होती है। ड्राई स्किन की समस्या से बचने के लिए नहाने के बाद अच्छे मॉइस्चराइजर का यूज़ करें। त्वचा को हर समय हाइड्रेटेड रखना जरूरी है। इसके लिए पानी भरपूर पियें।

खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ना

मेनोपॉज के बाद दिल से रिलेटेड डिसऑर्डर हो सकते हैं। शरीर में अच्छा कोलेस्ट्रॉल घटने और खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है। हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। मेनोपॉज के दौरान ऑयली फूड और मीठी चीजे कम से कम खाएं।

हड्डियां कमजोर होना

पुरुषों और महिलाओं दोनों में एस्ट्रोजेन हार्मोन पाया जाता है। यह हड्डियों के डेवलपमेंट के लिए जरूरी होता है। हड्डियां बनाने में ओस्टियोब्लास्ट अहम भूमिका निभाती हैं। मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन में कमी देखने को मिल सकती है। इसका ओस्टियोब्लास्ट कोशिकाएं बुरी तरह से प्रभावित होती हैं जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। मेनोपॉज के दौरान ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है।

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