Story Of Rani Laxmibai: ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ डट कर लड़ने वाली वीरांगना

Story Of Rani Laxmibai: ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ डट कर लड़ने वाली वीरांगना Story Of Rani Laxmibai: ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ डट कर लड़ने वाली वीरांगना

Swati Bundela

20 Jul 2022

publive-image"उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी। वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं।" यह लाईन अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने रानी लक्ष्मीबाई के बारे में कहा था जब उन्होनें लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा। इससे आप अंदाज़ा लगाइए कि कितनी स्ट्रांग और पावरफुल पर्सनेलिटी थी लक्ष्मीबाई की। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई वो योद्धा थी, जिसने अपने देश के आज़ादी के लिए अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाई और उनसे लड़ाई लड़ी और अपनी जान गवां दी। यह आगे चलकर अपने देश के हर एक नागरिक के अंदर आज़ादी की चिंगारी बन गयी और अपने देश की हर एक महिला के लिए इस्पीरेशन बन गयी। 

मणिकर्णिका का बचपन

रानी लक्ष्मीबाई का मायके का नाम मणिकर्णिका था इसलिए उन्हें मनु बाई के नाम से भी जाना जाता था। उनका जन्म काशी में जिसको आज के समय में वाराणसी या बनारस के नाम से जाना जाता है, वहा 19 नवंबर 1828 में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता को भागीरथी तांबे के नाम से जाना जाता है ।

जब लक्ष्मीबाई बहुत छोटी थी, मतलब 3 या फिर 4 साल की, तब उनकी मां की मृत्यु हो गयी। उसके बाद पिता अपनी बेटी के साथ बिठूर चले गए। वहा वो बाजीराव पेशवा के साथ रहने लगे। जिस बचपन में सभी बच्चें ज्यादातर खिलौनों से खेलते है। उसी बचपन में लक्ष्मीबाई युद्ध के हथियारों से खेलती थी। युद्ध में उपयोग होने वाले कई सारे प्रकार वो सीखती थी। जैसे घुड़सवारी करना, तलवारबाजी सीखना और ऐसे ही बहुत सारे टेलेंट उनमें भरपूर थे। लक्ष्मीबाई जो एक बुद्धिमान, शूरवीर और सुंदर लड़की थी, अपना सारा बचपन बाजीराव पेशवा के छत के नीचे बिताया।

जब महारानी मणिकर्णिका बनी झांसी के राजा की रानी

जब मनुबाई मतलब मणिकर्णिका 15 साल की हुई तब उनका  विवाह मई 1850 में झांसी के राजा गंगाधर राव नयालकर के साथ कर दिया गया, जहा उनको शादी के बाद लक्ष्मीबाई नाम मिला। तबसे उनको सभी लोग लक्ष्मीबाई के नाम से जानने लगे। साल 1851 में झांसी के राजा को उनके घर का वारिस मिला, जिनका नाम रखा गया दामोदर राव। लेकिन यह खुशी राजा-रानी के जीवन में ज्यादा टाईम तक नही ठहर सकी और सिर्फ 4 महीने बाद उन्होने अपने बच्चे को खो दिया। अपने बच्चे की मौत से रानी लक्ष्मीबाई काफी उदास रहने लगी थी और फिर उस उदासी को दूर करने के लिए महाराज गंगाधर राव नयालकर ने एक बच्चा गोद ले लिया। 

महाराजा-महारानी अपने खो चुके बच्चे की यादों से उभर नही पाएं थे तो उन्होनें इस बच्चे का नाम भी दामोदर राव ही रख दिया। कुछ सालों बाद महाराज गंगाधर राव लगातार बीमार रहने लगे और फिर 21 नवंबर 1853 को उनकी मौत हो गई। उनके जाने के बाद झांसी की सारी ज़िम्मेदारियां रानी लक्ष्मीबाई को अकेले ही बिना किसी के सहारे संभालना था। लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। जब राजा गंगाधर राव जिंदा थे तभी उन्होने अपने गोद लिए बच्चे दामोदर राव को अपना बेटा मानकर अंग्रेज सरकार को इंफोर्म कर दिया था पर 27 फरवरी 1854 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने गोद लिए बच्चे को झांसी का वारिस मानने से इंकार कर दिया और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह खबर पाते ही रानी के मुहं से केवल यह वाक्य निकले की, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से शुरूआत हुई भारत कि पहली आज़ादी की क्रांति की।

1857 के विद्रोह की शुरूआत

जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने मानने से इंकार कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा और एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में रहने लगी। उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में शरण ली थी। अंग्रेज़ी सरकार से लड़ने के लिए रानी ने वकील जॉन लैंग की हेल्प लीं जो उस समय ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीते थे। लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, 'मुफ़ुस्सलाइट' छापा करते थे। लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का ए़डमिनिस्ट्रेशन उन्हें पसंद नहीं करता था क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश और सवाल किया करते थे। 

जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था। रानी लक्ष्मीबाई अपने शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं। तभी अचानक रानी के पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया। लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, 'द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.'

किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, 'रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं। अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था। मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था। हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थीं और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी। उनका रंग बहुत गोरा नहीं था। उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था। सिवाए सोने की बालियों के। उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी। जो चीज़ उनके पर्सनेलिटी को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़।'

अपने भारत देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुलामी का विरोध करने के लिए 4 जून 1857 में पहले युद्ध की शुरूआत हुई। जिसमे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सबसे आगे थी। नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदी सभी महारानी का साथ देने के लिए एकजुट हो गए। भारत की जनता में विद्रोह की ज्वाला भभक गई। तभी अंग्रेजों के कमांडर सर ह्यूरोज ने अपनी सेना को संगठित कर विद्रोह को दबाने का कोशिश किया। उन्होंने सागर, गढ़कोटा, शाहगढ़, मदनपुर, मडखेड़ा, वानपुर और तालबेहट पर अधिकार कियाऔर अत्याचार किए। फिर झांसी की ओर अपना कदम बढ़ाया।

लक्ष्मीबाई पहले से ही सतर्क थीं और वानपुर के राजा मर्दनसिंह से भी इस युद्ध की सूचना तथा दुश्मनों के मूवमेंट पर नज़र बनाए हुए थी। 23 मार्च 1858 को झांसी का हिस्टोरीकल युद्ध शुरू हुआ। कुशल तोपची गुलाम गौस खां ने झांसी की रानी के ऑर्डर पर तोपों के निशानें साधकर ऐसे गोले फेंके कि पहली बार में ही अंग्रेजी सेना के छक्कें छूट गए।

बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो ख़ुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जब-जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर अटेक कर देते थे। उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भटका दें। कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे। उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली। इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था। इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे। इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गईं। उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई।

जॉन हेनरी सिलवेस्टर जो उस लड़ाई में मौजूद थे, ने अपनी किताब 'रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया' में लिखा, "अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, 'मेरे पीछे आओ.' पंद्रह घुड़सवारों का एक जत्था उनके पीछे चल दिया। वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग ग। अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, 'दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर।"

रानी और उनके साथियों अभी एक मील का सफ़र तय कर कोटा की सराय पहुंचे ही थे कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ गए। लड़ाई फिर से शुरू हुई। रानी के एक सैनिक से दो-दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे। तभी रानी को अचानक अपने बायें सीने में हल्का-सा दर्द महसूस हुआ। एक अंग्रेज़ी सैनिक ने जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी। वो तेज़ी से मुड़ीं और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार लेकर टूट पड़ीं।

रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अपनी छोटी-सी सशस्त्र सेना से अंगरेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। रानी ने बहादुरी और खुलेरूप से अंग्रेज़ों का सामना किया। वे अकेले ही अपनी पीठ के पीछे दामोदर राव को कसकर घोड़े पर सवार हो, अंगरेजों से लड़ाई लड़ती रहीं। बहुत दिन तक युद्ध का इस तरीकें से चलना मुश्किल था। सरदारों के कहने पर रानी कालपी पहुंची। लेकिन, वहां जाकर भी वे शांत नहीं बैठीं। उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से जैसे-तैसे कर बात-चीत किया और आगे की प्लानिंग बनाई।

सेनापति रोज़ अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करता रहा। आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने ग्वालियर का किला तगड़ा युद्ध करके अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ। महारानी लक्ष्मीबाई कटती रहीं लेकिन दुश्मनों को काटती भी रही। अपनी जान गंवाते वक्त रानी ने अंतिम शब्द यही कहें की "अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए." ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया। उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया।

कैप्टन क्लेमेंट वॉकर हेनीज, जो उस लड़ाई में मौजूद थे, ने बाद में रानी के जीवन के अंतिम पलों को कुछ इस तरह बताया "हमारी लड़ाई ख़त्म हो चुकी थी। सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी। बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था। कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया। हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया। बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।"  कुछ इस तरह एक वीर महिला अपने साहस और तेज़ी के साथ अपने राज्य को बचाते-बचाते शहीद हो गई।

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