किसी भी विषय पर अपना ओपिनियन रखना , पोलिटिकल व्यूज़ (political views) देना , खुद की आज़ादी की ख्वाइश रखना गलत नहीं है। इसका अधिकार सबको है , चाहे वो किसी भी जेंडर का क्यों न हो। लेकिन एक औरत का outspoken होना , किसी भी टॉपिक पर अपने विचार रखना आसान नहीं होता। भारतीय समाज इन औरतों को दबाने की कोशिश करता है।

image

हमारे समाज में ऐसी कई महिलाएं है जो बड़ी ही बेबाक़ी से अपने और दूसरों के लिए आवाज़ उठाती है, अपना पॉइंट ऑफ़ व्यू (point of view) रखती है। ये सभी महिलाएं वो हैं जिन्होंने हम सबको प्रेरणा देने का काम किया है। स्वरा भास्कर और विद्या बालन उन महिलाओं में से एक है।

आइये जानते है क्या इन्हे सोसाइटी द्वारा ‘likeable ‘ होने से फ़र्क पड़ता है ?

स्वरा भास्कर

स्वरा भास्कर ने अपना ओपिनियन शेयर करते हुए बताया कि “मैं एक एक्टर हूँ ,और अगर मैं एक बड़ी स्टार बनना चाहती हूँ तो ये हमारा बिज़नेस है कि लोग हमे पसंद करे। लेकिन कभी-कभी अगर आपको किसी पर्टिकुलर विचारधारा (ideology) के लोग dislike करते है ,तो इसका मतलब ये है कि आप में कुछ अच्छा है। इसलिए ज़रूरी नहीं के हर कोई आपको लाइक करे।”

मेरा खुदके लिए likeable होना मैटर करता है ,दूसरों के लिए नहीं “-विद्या बालन

विद्या बालन

“जब मैं छोटी थी तब मुझे लोग मोटी बोलते थे ,मुझे लगता था सब प्यार से मुझे मोटी बोलते है क्योंकि मोटी का मतलब होता है क्यूट (cute)। लेकिन जैसे -जैसे मैं बड़ी हुई ,लोग मुझे बोलने लगे ‘अरे तुम कितनी सुन्दर हो ,थोड़ा वेट लूज़ क्यों नहीं करती’ ,तब मुझे ये एक कमी के रूप में महसूस होने लगा। एक ही लाइन का समय के साथ मतलब बदल गया ,दोनों में इतना फ़र्क है ये बाद में महसूस हुआ। जब मैंने वेट लूज़ कर लिया तो लोग बोलने लगे ‘अरे तुम कितनी पतली हो गयी ,पहले जब तुम हँसती थी तब तुम्हारे फूले हुए गाल दिखते थे लेकिन अब तो बिल्कुल कमज़ोर लग रही हो’ तब मुझे ये बात समझ आयी के हम हर किसी को खुश नहीं कर सकते। सबके लिए likeable नहीं हो सकते इसलिए सिर्फ मेरा खुश रहना ज़रूरी है।“

ये समाज हमेशा से एक परफेक्ट वूमन चाहता है जबकि कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता। आप जैसे है बहुत अच्छे हैं, दूसरों के लिए आपको बदलने की ज़रूरत नहीं।

पढ़िए : मुंबई सीएसटी स्टेशन पर एकलौती महिला एनाउंसर सुषमा होंन्दोकार से मिलें

Email us at connect@shethepeople.tv