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हम चाहे कितनी भी मॉडर्न सोच की बात कर लें, लेकिन बच्चों की परवरिश का बर्डन आज भी ज़्यादातर माँ के कंधों पर ही डाल दिया जाता है। बच्चे की एजुकेशन, हेल्थ, हैबिट्स, वैल्यूज और यहाँ तक कि उसका बिहेवियर—इन सबके लिए माँ को रेस्पोंसिबल ठहराया जाता है। अगर बच्चा अच्छा निकले, तो “माँ ने अच्छी परवरिश दी” और अगर कुछ गड़बड़ हो जाए, तो भी माँ को ही पॉइंट किया जाता है। यह सोच आज भी सोसाइटी में गहराई से जमी हुई हैमें चल रही है।
बच्चों की परवरिश सिर्फ माँ की रिस्पांसिबिलिटी क्यों मानी जाती है?
1. माँ को नैचुरल केयरटेकर मान लिया गया
सोसाइटी ने बहुत पहले ही यह तय कर दिया कि माँ का रोल केयर करना है और पिता का रोल कमाना है। इसी वजह से माँ को नैचुरल केयरटेकर मान लिया गया है। बच्चे को खाना खिलाना, सुलाना, उसकी फीलिंग्स समझना—ये सब काम अपने आप माँ की रिस्पांसिबिलिटी मान लिए जाते हैं। जबकि सच यह है कि केयर करना सिर्फ माँ की ही रिस्पांसिबिलिटी नहीं बल्कि ये दोनों पैरेंट्स की इक्वल रिस्पांसिबिलिटी है।
2. पिता की इन्वॉल्वमेंट को “मदद” कहा जाता है
जब कोई पिता बच्चे को स्कूल छोड़ता है या उसके साथ समय बिताता है, तो उसे कहा जाता है कि वह “हेल्प कर रहा है”। ये दिखाता है कि सोसाइटी अब भी परवरिश को माँ का काम मानती है। पिता की इन्वॉल्वमेंट को रिस्पांसिबिलिटी नहीं, एक्स्ट्रा एफर्ट की तरह देखा जाता है, जिससे इम्बैलेंस और बढ़ जाता है।
3. वर्किंग मदर्स पर दोगुना प्रेशर
अगर माँ वर्किंग है, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह ऑफिस और घर दोनों को परफेक्ट मैनेज करे। बच्चा बीमार हो जाए, स्कूल से कॉल आ जाए या होमवर्क अधूरा रह जाए—हर सिचुएशन में सबसे पहले माँ से सवाल किया जाता है। पिता का ऑफिस जाना ज़रूरी माना जाता है, लेकिन माँ का करियर अक्सर सेकेंडरी समझ लिया जाता है।
4. सोसाइटी की सोच
बच्चे की परवरिश पर सबसे ज़्यादा कमेंट्स माँ को ही सुनने पड़ते हैं। “माँ ध्यान नहीं देती”, “माँ ने सिखाया नहीं” जैसे जजमेंट आम हैं। पिता की एब्सेंस को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, लेकिन माँ की छोटी सी गलती भी बड़ी बना दी जाती है।
5. इक्वल पैरेंटिंग की ज़रूरत
बच्चों की परवरिश किसी एक पैरेंट की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। बच्चे को इमोशनल सेफ्टी, डिसिप्लिन और वैल्यूज़ दोनों पैरेंट्स से मिलनी चाहिए। जब माँ और पिता दोनों इक्वल इन्वॉल्व होते हैं, तब ही बच्चा एक बैलेंस्ड ह्यूमन बीइंग बन पाता है। परवरिश को सिर्फ माँ की रिस्पांसिबिलिटी मानना न सिर्फ़ महिलाओं पर प्रेशर डालता है, बल्कि बच्चों के डेवेलपमेंट को भी लिमिटिड कर देता है।
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